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गुरुवार, 21 मार्च 2019

साबर दशामाता साधना

साबर दशामाता साधना

 

             दशा पर्व समीप ही है। यह इस बार ३० मार्च २०१ को आ रहा है। आप सभी को दशा पर्व की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

             तन्त्र के क्षेत्र में एक दिवस ऐसा भी आया था, जब तन्त्र की दशा में एक मंगलकारी परिवर्तन आया, जिसे साधक दस महाविद्या सिद्धि दिवस भी कहते हैं। इसी दिन शिव ने दस महाविद्याओं पर से पर्दा उठाया था और सम्पूर्ण विश्व ने जाना था कि दस महाविद्या क्या है

             इसी दिन चैत्र कृष्णपक्ष की दशमी को भारत के कई क्षेत्रों में दशा माता का पूजन तथा व्रत किया जाता है। होली के दस दिन बाद मनाए जाने के कारण इसे होली दशा कहा जाता है। मनुष्य की दशा ठीक ना हो तो कई बार निरन्तर उपाय करने के बाद भी वह स्वास्थ्य की दृष्टि से परेशान रहता है तो कई बार आर्थिक परेशानियाँ उसका पीछा नहीं छोड़ती। भाग्य साथ नहीं देता और उसके बनते हुए काम भी बिगड़ जाते हैं। अपने घर परिवार की इसी दशा को सुधारने की मनोकामना से सुहागिन महिलाएँ चैत्र कृष्ण पक्ष की दशमी को दशा माता का पूजन एवं व्रत करती है।

             अनेक स्थानों पर यह व्रत होली के अगले दिन से ही प्रारम्भ हो जाता है। प्रथम दिन महिलाएँ दीवार पर स्वास्तिक बनाकर मेहँदी और कुमकुम की दस-दस बिन्दियाँ बनाती है और इसके बाद नौ दिन तक रोज इनका पूजन करती है और दशा माता की कथाएँ सुनती हैं। महिलाएँ नौ दिन तक व्रत रखती हैं तथा फिर दसवें दिन अर्थात चैत्र कृष्ण पक्ष की दशमी को पीपल के पेड़ की छाँव में दशा माता का पूजन कर व्रत सम्पन्न करती है। कच्चे सूत के साथ पीपल की परिक्रमा की जाती है उसके बाद पीपल वृक्ष को चुनरी ओढ़ाई जाती है। पीपल छाल को स्वर्ण समझकर घर लाया जाता है और तिजोरी में सुरक्षित रखा जाता है। महिलाएँ दल में बैठकर व्रत से सम्बन्धित कहानियाँ कहती और सुनती है। दशामाता पूजन के पश्चात पथवारी पूजी जाती है।

           परन्तु दशा माता का शाबर तन्त्र में भी अत्यधिक महत्व है। यह बात कम ही साधकों को ज्ञात है कि शाबर तन्त्र में भी दशा माता की साधना की जाती है तथा अपनी दुर्दशा का नाश किया जाता है।

           इस बार यह दिवस ३० मार्च २०१९ को आ रहा है। इस दिन आप दशा माता से जुड़ी साधना कर सकते हैं। इस साधना को करने से साधक की दशा सुधरती है अर्थात उसके जीवन को उच्चता की प्राप्ति होती है। लाख परिश्रम के बाद भी आपका जीवन दुर्गति पूर्ण ही है तो दशा माता की साधना अवश्य करें।

           इससे साधक की दशा में परिवर्तन होता है तथा दशा माता की कृपा से प्रगति के मार्ग खुल जाते हैं। जीवन में आ रही रुकावटें समाप्त हो जाती है। यदि आपके व्यापार पर या आप पर किसी ने तन्त्र क्रिया की हो तो उसका भी नाश हो जाता है। जीवन से नकारात्मक ऊर्जा पलायन कर जाती है तथा जीवन में आनन्द की अनुभूति आती है।

साधना विधान :-----------

           यह साधना आप ३० मार्च २०१९ की रात्रि ९ के बाद करें। सम्भव हो तो इस दिन व्रत रखें, केवल फल का ही सेवन करें। रात्रि में स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें तथा पीले आसन पर उत्तर या पूर्व की ओर मुख कर बैठ जाएं। भूमि पर बाजोट रखकर पीला वस्त्र बिछा दें। वस्त्र पर अक्षत की ढेरी बनाकर उस पर एक मिट्टी का दीपक स्थापित कर दें। इसमें तिल का तेल भरकर दीपक प्रज्वलित करें। दीपक की लौ आपकी ओर होनी चाहिए।

          सबसे पहले पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का सामान्य पूजन सम्पन्न करें और गुरुमन्त्र का चार माला जाप करें। फिर सद्गुरुदेवजी से साबर दशा माता साधना सम्पन्न करने हेतु मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लें और उनसे साधना की पूर्णता एवं सफलता के लिए निवेदन करें।

          तत्पश्चात सामान्य गणपति पूजन सम्पन्न करके "ॐ वक्रतुण्डाय हुम्" मन्त्र की एक माला जाप करें और भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता एवं सफलता के लिए प्रार्थना करें।

          तदुपरान्त साधक संक्षिप्त भैरव पूजन सम्पन्न करें और "ॐ भं भैरवाय नमः" मन्त्र की एक माला जाप करें। फिर भगवान भैरवनाथजी से साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए निवेदन करें।

          अब दीपक को दशा माता का स्वरूप मानकर उसकी पूजा करें। कुमकुम, हल्दी, अक्षत आदि से दीपक का पूजन करें। भोग में कोई भी पीले रंग की मिठाई रखें। दशा माता से अपनी दशा को परिवर्तित करने की प्रार्थना करें तथा कहें कि माँ! मेरे जीवन को प्रगति प्रदान करें।

          इसके बाद निम्नलिखित शाबर मन्त्र की  एक माला जाप करें -----

शाबर मन्त्र :-----------

       ।। ॐ नमो आदेश गुरु को,
             दशा पलटे दशा माता, सुख समृद्धि प्रदान करे,
             धन बरसे सुख बरसे, दशा माँ कल्याण करे,
             आदेश गुरु गोरखनाथ को आदेश ।।

OM  NAMO  AADESH  GURU  KO
DASHA  PALTE  DASHA  MAATA  SUKH-SAMRIDDHI  PRADAAN  KARE
DHAN  BARSE  SUKH  BARSE  DASHA  MAAN  KALYAANN  KARE
AADESH  GURU  GORAKHNAATH  KO  AADESH.

          इस साधना में आपको माला स्वयं बनानी होगी। एक लाल धागा इतना बड़ा ले लीजिए, जिसमें १०८ गठान लगाई जा सके तथा एक सुमेरु की गाँठ लगाई जा सके। इसी माला से आपको एक माला जाप करना होगा।

          जाप के पश्चात् अग्नि प्रज्वलित कर घी तथा पञ्च मेवे को मिलाकर अग्नि में १०८ आहुति प्रदान करें। आहुति के पश्चात् जो माला आपने  बनाई थी, उसे गले में धारण कर लें तथा माता से पुनः प्रार्थना कर आशीर्वाद प्राप्त करें। प्रसाद में जो मिठाई अर्पित की गई थी, उसे पूरे परिवार को दें तथा स्वयं भी ग्रहण करें।

          अगले दिन अक्षत, वस्त्र तथा दीपक किसी भी वृक्ष के नीचे रख आएं। इस प्रकार यह एक दिवसीय साधना पूर्ण होती है, जो आपके जीवन को बदल देने में सक्षम है।

          आप सभी की साधना सफल हो और दशा पर्व आपके लिए मंगलमय हो। मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

          इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल गुरुजी को आदेश आदेश आदेश ।।।


मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

साबर लक्ष्मी आबद्ध प्रयोग


साबर लक्ष्मी आबद्ध प्रयोग



          पंच दिवसीय दीपावली महापर्व निकट ही है। इसका आरम्भ ५ नवम्बर २०१८ से हो रहा है और इसका समापन ९ नवम्बर २०१८ को होगा। आप सभी को दीपावली महापर्व की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          धर्म जीवन का आधार है, लेकिन धर्म से जीवन जीने के लिए प्रधान आवश्यकता अर्थ की रहती है और इसीलिए इसे दूसरा पुरुषार्थ कहा गया है। जीवन प्राप्त हुआ है तो धर्म के साथ जीवन जीते हुए अर्थ की प्राप्ति की जाए, उससे जीवन चलाया जाए, तभी जीवन का तीसरा और चौथा पुरुषार्थ काम और मोक्ष सफल हो सकते हैं।

          सामान्य रूप से अर्थ का तात्पर्य धन अर्थात रुपया, पैसा मान लिया गया है, जबकि यह अपने आप में एक अत्यन्त सीमित अर्थ है। केवल रुपये, पैसे इत्यादि से जीवन चल ही नहीं सकता है। यह तो अर्थ का एक छोटा-सा रूप है और इसीलिए हमने हिन्दू मान्यता में अर्थ का तात्पर्य लक्ष्मी को माना है। सामान्य रूप से लक्ष्मी का जो स्वरूप देखते हैं, वास्तविक रूप में लक्ष्मी का स्वरूप उससे बिल्कुल अलग है। लक्ष्मी के आठ स्वरूपों को जीवन का आधार, अर्थ का आधार माना गया है। लक्ष्मी के इन आठ स्वरूपों को अष्टलक्ष्मी कहा गया है और जिसके जीवन में अर्थ अपने पूरे स्वरूप में, अष्ट लक्ष्मी के स्वरूप में विद्यमान है, वही जीवन पूर्ण कहा गया है।

          लक्ष्मी की कृपा से ही मनुष्य सांसारिक जीवन में अपने तीसरे पुरुषार्थ काम का पूर्ण रूप से उपयोग कर वह मोक्ष मार्ग पर गतिशील हो सकता है। लक्ष्मी का यह स्वरूप जो कि विद्या माया स्वरूप हैं, वह मनुष्य को निरन्तर कर्म पथ पर अग्रसर करते हैं।

          लक्ष्मी मनुष्य जीवन की आवश्यकता है और जीवन का सौन्दर्य भी है। प्रत्येक युग में लक्ष्मी की महत्ता रही है और रहेगी ही। वर्तमान में जब मनुष्य की बाह्य आवश्यकताएँ बढ़ती जा रही है, तब लक्ष्मी की कामना तो होगी ही।

          लक्ष्मी का दूसरा नाम चंचला भी है। कई बार अत्यधिक प्रयास करने पर भी जब लक्ष्मी घर में टिक नहीं पाती है, धनागम होता है, कहाँ जाता है? पता ही नहीं चलता है कमाई से अधिक खर्च होता है ऋण भार से व्यक्ति दबता चला जाता है। तब जीवन में आनन्द, मस्ती और उमंग समाप्त हो जाता है।

          यह सर्वमान्य नियम भी नहीं है कि प्रयत्न करो और लक्ष्मी आती रहे। कई बार प्रयास करने के बाद भी धन का आगमन नहीं हो पाता। जीवन में जूझते रहते हैं, फिर भी घर की दरिद्रता समाप्त नहीं होती। इस प्रकार घर में अविश्वास, बिखराव बढ़ता चला जाता है और घर के घर टूटते चले जाते हैं, उजड़ते चले जाते हैं।

          इस स्थिति से उबरने के लिए मनुष्य को साबर साधना ही अधिक कारगर सिद्ध हो सकती है और हुई है। यह वही प्रयोग है जो सबके लिए आवश्यक है।

साधना विधि :----------

          यह साधना प्रयोग आप धन त्रयोदशी से आरम्भ करें। यदि आपके लिए यह सम्भव न हो तो इसे किसी भी पूर्णिमा की मध्य रात्रि से शुरू किया जा सकता है।

          साधक रात के लगभग ११ बजे के बाद स्नान करके लाल वस्त्र धारण कर लें। फिर लाल आसन बिछाकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाएं। अपने सामने किसी बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर एक ताँबे अथवा स्टील की थाली (बड़ी प्लेट) रखें। इस थाली में कुमकुम से ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण का निर्माण करे। त्रिकोण के एक कोने में ऊपर पाँच "हकीक पत्थर" रखें, नीचे के दूसरे कोने में पाँच "मूँगे के टुकड़े" रखें तथा नीचे के तीसरे कोने में पाँच "रुद्राक्ष के दाने" रख लें।

          अब सर्वप्रथम साधक पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का ध्यान करके गुरुमन्त्र का यथाशक्ति जाप करे। फिर सद्गुरुदेवजी से साबर लक्ष्मी आबद्ध प्रयोग सम्पन्न करने हेतु मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लेकर उनसे साधना की सफलता के लिए प्रार्थना करें।



           इसके बाद में त्रिकोण के प्रत्येक कोने पर तेल के दीपक जलाकर रखें। त्रिकोण के मध्य में सरसों की ढेरी बनाकर एक चौमुखा तेल का दीपक जलाकर रखें। इसके बाद हकीक माला से निम्न मन्त्र की सात माला मन्त्र जाप करें -----

साबर मन्त्र :----------

॥ ओम नमो आदेश श्री गुरु को
    गजानन वीर बसे मसान
    अब दो ऋद्धि का वरदान
    जो-जो मांगू सो-सो आन
    पाँच लड्डू सिर पर सिन्दूर
    हाट-बाट का माटी मसान की
    सब ऋद्धि हमारे पास पठेओ
    शब्द साँचा फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ॥

OM NAMO AADESH SHRI GURU KO
GAJAANAN VEER BASE MASAAN
AB DO RIDDHI KA VARDAAN
JO-JO MAANGU SO-SO AAN
PAANCH LADDOO SIR PAR SINDOOR
HAAT-BAAT KA MAATI MASAAN KI
SAB RIDDHI HAMARE PAAS PATHEO
SHABD SAANCHA PHURO MANTRA ISHWARO VAACHA.

          मन्त्र जाप के पश्चात एक आचमनी जल भूमि पर छोड़कर समस्त जाप समर्पित कर दें। इस साधना क्रम को नित्य तीन दिनों तक सम्पन्न करें। प्रतिदिन मन्त्र जाप पूरा होने पर रात्रि में साधक वहीं पर सो जाए।

          चौथे दिन प्रातः सभी सामग्री लाल वस्त्र में बाँधकर घर में रख ले। मन्त्र जप द्वारा इस साधना को जब आप पूरा कर ले, तब धनागम का कोई न कोई मार्ग सुलभ होगा। लक्ष्मी की प्राप्ति इससे होती ही है। यह प्रयोग प्रामाणिक और परीक्षित है। यही इसकी विशेषता है। आप करें और सफलता प्राप्त करें, यह आपका सौभाग्य होगा।

          आपके लिए यह दीपावली महापर्व मंगलमय हो और यह दीपावली आप के जीवन में धन-धान्य, सुख-समृद्धि, यश एवं अपार खुशियाँ लेकर आए। मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए ऐसी ही कामना करता हूँ।

          इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिलजी को आदेश आदेश आदेश ॥

शनिवार, 25 अगस्त 2018

कृष्ण सरस्वती साधना


कृष्ण सरस्वती साधना


         श्रीकृष्ण जन्माष्टमी निकट ही है। यह २ सितम्बर २०१८ को आ रही है। आप सभी को जन्माष्टमी पर्व की अग्रिम रूप ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          भगवान विष्णु के अवतरण प्रत्येक युग में सम्भव हुए हैं और होते रहेंगे, किन्तु भगवान श्रीकृष्ण जैसा अवतरण दुर्लभ ही हुआ है तथा इस बात की पुष्टि केवल जनसामान्य की भावनाओं के आधार पर ही नहीं वरन् शास्त्रीय आधार पर भी की जा सकती है, जहाँ सभी शास्त्रों ने एकमत होकर श्रीकृष्ण अवतरण को ही सम्पूर्ण माना है, जीवन के भौतिक पक्षों के प्रति भी और जीवन के आध्यात्मिक पक्षों के प्रति भी। भगवान श्रीकृष्ण की प्रचलित छवि में उन्हें ईश्वर तो माना गया, किन्तु उनके साथ जुड़े साधना पक्ष और उनकी प्रबल आध्यात्मिकता की उपेक्षा कर दी गई, जबकि इस बात के पूर्ण प्रमाण मिलते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण कुशल तन्त्रवेत्ता और साधक भी थे, जिन्होंने शिष्य रूप में अपने गुरु सान्दीपनि के आश्रम में रहकर अनेक साधनाओं को सीखा था।

          वस्तुतः कृष्ण "शब्द" ही अपने आप में जीवन का अत्यन्त गम्भीर रहस्य समेटे हैं। इस शब्द में जहाँ "क" काम का सूचक है, वहीं "ऋ" श्रेष्ठ शक्ति का प्रतीक है, "ष" षोडश कलाओं का रहस्य समेटे हैं तो "ण" निर्वाण का बोध कराने में समर्थ है और इस प्रकार "कृष्ण" शब्द का तात्पर्य है, जो सामर्थ्य पूर्वक पूर्ण भोग व मोक्ष दोनों में समान गति बनाए रखे तथा इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण की साधना-आराधना अपने आप में सम्पूर्ण साधना कही गई।

          भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी अनेक कथाओं के पीछे भी उनके साधक होने की कथा ही निहित है, जिसे अलौकिकता का आवरण दे दिया गया है और उनसे जुड़ा साधना पक्ष भुला दिया गया है। अनेक राक्षसों का वध या अपने गुरु के मृत पुत्र को जीवित करना जैसी अनेक घटनाएँ उनकी इसी विलक्षणता की परिचायक है और ऐसे अलौकिक युगपुरुष के जन्म का अवसर तो स्वतः सिद्ध मुहूर्त है ही।

          क्या आपके बच्चे पढ़ाई में कमजोर हैं? क्या आपका मन अशान्त रहता है? घर में प्रसनता की कमी है?  क्या आप ज्ञान प्राप्ति चाहते हैं, जिससे एक नई  रोशनी पैदा हो और घर में प्रेम पूर्ण वातावरण बने, जिससे प्रसन्न होकर आपका हृदय खुशी से भर उठे, बुद्धि का विकास हो और सभी ओर से प्रसन्नता  के सन्देश मिले। यह हर कोई चाहता है कि उसे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो। मैं अपने स्वयं के द्वारा परखी हुई या यह कहूँ कि पूर्ण रूप से अनुभूत की हुई साधना कृष्ण सरस्वती साधनासाबर विधि से दे रहा हूँ।

                    मुझे आशा है कि आप इस साधना का लाभ अवश्य प्राप्त करेंगे। यह साधना आपकी बुद्धि का विकास करेगी और मन में एक नवीन शक्ति का संचार करेगी। यह एक ओर जहाँ बच्चों में ज्ञान का विकास करती है, वही दूसरी ओर मन में असीम शान्ति भी देती है। आत्मचिन्तन का मार्ग खोल देती है। दिल में प्रेम के अंकुर को प्रस्फुटित कर चेतना को विकसित करती है, क्योंकि श्रीकृष्ण प्रेम का ही रूप है।

        यह मन्त्र उच्चकोटि के सन्तों द्वारा दिया गया है और आपके लाभ  के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है।

साधना विधान :-----------

          इस साधना को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से आरम्भ करें। इसके अलावा इसे बसन्त पंचमी अथवा किसी भी शुक्लपक्ष के गुरुवार से शुरू किया जा सकता है। इस साधना के लिए तिथि पूर्णिमा, पंचमी एवं अष्टमी विशेष रूप से फलदायी है।

          इस साधना के लिए सुबह का समय उत्तम है, लेकिन यह साधना रात्रि ७ बजे से १० बजे के मध्य भी की जा सकती है। साधना हेतु वस्त्र पीले रंग के उत्तम है, लेकिन सफ़ेद वस्त्र भी धारण किए जा सकते हैं। आसन पीला या सफ़ेद रंग का ही लें। साधना में दिशा उत्तर रहेगी।

          साधक स्नान आदि से निवृत्त होकर साधना के निमित्त बैठ जाए। अपने बाजोट पर पीला वस्त्र बिछा लें। उस पर पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी, भगवान श्रीकृष्ण एवं माँ सरस्वती के चित्र स्थापित कर लें। शुद्ध घी का दीपक और धूप-अगरबत्ती प्रज्ज्वलित कर दें।

          सबसे पहले सद्गुरुदेवजी का सामान्य पूजन करें और साबर कृष्ण सरस्वती मन्त्र को एक कागज़ पर लिखकर उनके श्रीचरणों में रख दें। फिर गुरुमन्त्र की चार माला जाप के पश्चात् गुरुदेव से साधना की आज्ञा लेते हुए मन्त्र ग्रहण करें। अर्थात कागज़ उठाकर मन्त्र बोलकर तीन बार पढ़ें। मन्त्र पढ़ते समय ऐसी भावना करें कि जैसे सद्गुरुदेवजी आपको मन्त्र दे रहे हैं और आप मन्त्र ग्रहण कर रहे हैं। इस तरह मन्त्र दीक्षा पूर्ण हो जाती है और गुरुजी का साधना के लिए आशीर्वाद भी मिल जाता है।

          गुरुपूजन के पश्चात भगवान गणेशजी का, फिर माँ सरस्वती का पूजन करें और अन्त में कृष्ण भगवान का पूजन कर सफलता के लिए प्रार्थना करें। पूजन में गंगाजल, कुमकुम, अक्षत, पीले पुष्प, फल, मिश्री, मेवा आदि का प्रयोग करें। भोग में दूध का बना मिष्ठान्न अर्पित करें, यदि खीर हो तो अति उत्तम होगा। इस साधना में शुद्ध घी का दीपक जलाना आवश्यक है, जो साधना काल में पूरे समय जलता रहना चाहिए।

          इसके बाद मन्त्र जप शुरू कर सकते हैं। यह ११ दिन की साधना है। जाप के लिए माला सफेद हकीक की लें, अगर ना मिले तो एक घण्टा जाप कर सकते हैं, मिल जाए तो बहुत उत्तम होगा। आपको नित्य  ११ माला मन्त्र जाप करना है।

साबर मन्त्र :-----------

   ।। उठ सरस्वती दीपक बालो, हरिमन्दिर से हुए चानन,
    गुरु के ज्ञान ध्यान, पैज पत रखे आप श्री कृष्ण भगवान ।।

UTH SARASWATI DEEPAK BAALO HARIMANDIR SE HUYE CHAANAN
GURU KE GYAAN DHYAAN PAIJ PAT RAKHE AAP SHRIKRISHNA BHAGWAAAN.

          अगर हो सके तो दीपक की स्थिर लौ पर त्राटक करते हुए जाप करें। इस साधना के लिए यन्त्र की आवश्यकता नहीं है।

          मन्त्र जाप समाप्त होने के बाद एक आचमनी जल छोड़कर समस्त जाप समर्पित कर दे। इस प्रकार यह साधना ११ दिनों तक सम्पन्न करे।

          ११ वें दिन खीर का भोग बनाएं और पूजन करें। साधना पूर्ण होने पर खीर का भोग अर्पित करें। उसमें थोड़ा-सा शहद मिला कर जाप के वक़्त सामने अपने पास रखें। बाद में खीर अपने बच्चों को और पत्नी सहित स्वयं या घर के छोटे-बड़े सभी सदस्यों को वितरित कर दें और सद्गुरुदेवजी को धन्यवाद दें तथा सफलता की प्रार्थना करें। माला आप स्वयं पहन लें या बच्चे को पहना दें।

          आपकी साधना सफल हो और भगवान श्रीकृष्ण व माँ सरस्वती आपकी मनोकामना पूरी करे! मैं सद्गुरुदेव भगवानजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

          इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश।।।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

साबर धूमावती साधना


साबर धूमावती साधना


          आषाढ़ मासीय गुप्त नवरात्रि समीप है। यह १३ जुलाई २०१८ से शुरू हो रही है। आप सभी को गुप्त नवरात्रि की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          धूमावती देवी दस महाविद्याओं में सातवें स्थान पर मानी जाती हैं। इनकी उत्पत्ति बारे में दो कथाएँ प्रचलित हैं, पहली कथा तो यह है कि जब सती ने पिता के यज्ञ में स्वेच्छा से स्वयं को जलाकर भस्म कर दिया तो उनके जलते हुए शरीर से जो धुआँ निकला, उससे माँ धूमावती का जन्म हुआ, इसलिए वो हमेशा उदास रहती हैं। यानि धूमावती धुएँ के रूप में सती का भौतिक स्वरूप है। सती का जो कुछ बचा रहा, वह मात्र उदास धुआँ ही है।

          दूसरी कथा के अनुसार एक बार सती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर विचरण कर रही थीं, तभी उन्हें जोरों की भूख लगी। उन्होंने महादेवजी से अपनी क्षुधा का निवारण करने का निवेदन किया। कई बार भोजन माँगने पर भी जब भगवान शिव ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया, तब उन्होंने महादेव को ही उठाकर निगल लिया। उनके शरीर से धूम्र राशि निकली। शिवजी ने उस समय पार्वती जी से कहा कि आपकी सुन्दर मूर्त्ति धूएँ से ढँक जाने के कारण धूमावती या धूम्रा कही जाएगी।

          धूमावती महाशक्ति अकेली हैं तथा स्वयं नियन्त्रिका है। इनका कोई स्वामी नहीं है, इसलिए इसे विधवा कहा गया है। दुर्गा सप्तशती के अनुसार इन्होंने ही प्रतिज्ञा की थी, "जो मुझे युद्ध में जीत लेगा तथा मेरा गर्व दूर कर देगा, वही मेरा पति होगा। ऐसा कभी नहीं हुआ, अत: यह कुमारी हैं, यह धन या पतिरहित हैं अथवा अपने पति महादेव को निगल जाने के कारण विधवा हैं।

          नारदपाँचरात्र के अनुसार इन्होंने अपने शरीर से उग्रचण्डिका को प्रकट किया था, जो सैकड़ों गीदड़ियों की तरह आवाज करने वाली थी। शिव को निगलने का तात्पर्य है, उनके स्वामित्व का निषेध। असुरों के कच्चे माँस से इनकी अंगभूता शिवाएँ तृप्त हुईं, यही इनकी भूख का रहस्य है। इनके ध्यान में इन्हें विवर्ण, चंचल, काले रंगवाली, मैले कपड़े धारण करने वाली, खुले केशों वाली, विधवा, काकध्वज वाले रथ पर आरूढ़, हाथ में सूप धारण किये, भूख-प्यास से व्याकुल तथा निर्मम आँखों वाली बताया गया है।

          धूमावती की उपासना विपत्ति-नाश, रोग-निवारण, युद्ध-जय, उच्चाटन तथा मारण आदि के लिये की जाती है। शाक्त प्रमोद में कहा गया है कि इनके उपासक पर दुष्टाभिचार का प्रभाव नहीं पड़ता है। संसार में रोग-दु:ख के कारण चार देवता हैं। ज्वर, उन्माद तथा दाह रुद्र के कोप से, मूर्च्छा, विकलांगता यम के कोप से, धूल, गठिया, लकवा, वरुण के कोप से तथा शोक, कलह, क्षुधा, तृषा आदि निरऋति के कोप से होते हैं। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार धूमावती और निरऋति एक हैं। यह लक्ष्मी जी की ज्येष्ठा है, अत: ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न व्यक्ति जीवन भर दु:ख भोगता है।

          तन्त्र ग्रन्थों के अनुसार धूमावती उग्रतारा ही हैं, जो धूम्रा होने से ही धूमावती कही जाती हैं। दुर्गासप्तशती में वाभ्रवी और तामसीना से इन्हीं की चर्चा की गई है। ये प्रसन्न होकर रोग और शोक को नष्ट कर देती हैं तथा कुपित होने पर समस्त सुखों और कामनाओं को नष्ट कर देती हैं। इनकी शरणागति से विपत्तिनाश तथा सम्पन्नता प्राप्त होती है।

          ऋग्वेदोक्त रात्रिसूक्त में इन्हें सुतराकहा गया है। सुतरा का अर्थ सुखपूर्वक तारनेयोग्य है। तारा या तारिणी को इनका पूर्वरूप बतलाया गया है। इसलिए आगमों में इन्हें अभाव और संकट को दूर कर सुख प्रदान करने वाली भूति कहा गया है। धूमावती स्थिरप्रज्ञता की प्रतीक है। इनका काकध्वज वासनाग्रस्त मन है, जो निरन्तर अतृप्त रहता है। जीव की दीनावस्था भूख, प्यास, कलह, दरिद्रता आदि इसकी क्रियाएँ हैं अर्थात वेद की शब्दावली में धूमावती कद्रु है, जो वृत्रासुर आदि को पैदा करती है।
 
          आज यहाँ मैं माँ भगवती धूमावतीजी का साबर मन्त्र दे रहा हूँ, जो समस्त प्रकार के कल्याण हेतु शीघ्र फलदायी है। मन्त्र जाप के माध्यम से शत्रु बाधा एवं सभी प्रकार के कष्टों से राहत मिलती है।

साधना विधि :-----------

           यह साधना नवरात्रि काल में पहले दिन से आरम्भ करे। यह साधना ११ दिन की है। साधना में साधक के आसन-वस्त्र काले रंग के हो और दिशा दक्षिण मुख रहेगी। रात्रि ९ बजे के बाद साधक साधना के निमित्त बैठे। अपने सामने काले वस्त्र पर धूमावती चित्र स्थापित करें और गूगल धूप जला लें। इस साधना में चमेली के तेल का दीपक जलाए, जो साधना काल में बुझना नहीं चाहिए।

          पहले सामान्य गुरुपूजन करके गुरुमन्त्र की चार माला जाप करें और सद्गुरुदेवजी से साबर धूमावती साधना सम्पन्न करने हेतु मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लें तथा उनसे साधना की सफलता के लिए निवेदन करें।

          फिर भगवान गणपतिजी का स्मरण करके एक माला गणपति मन्त्र का जाप करें और उनसे साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

          इसके बाद साधक को साधना के पहले दिन संकल्प अवश्य लेना चाहिए।

          तत्पश्चात माँ धूमावती का सामान्य पूजन काजल, अक्षत, भस्म (राख) आदि से करें और किसी भी मिष्ठान्न का भोग लगाएं।

          फिर साधक काली हकीक माला से निम्नलिखित साबर मन्त्र की ११ माला जाप करें ----- 
 
साबर धूमावती मन्त्र :-----------

।। ओम नमो आदेश गुरूजी को,
  धूमावती माई भूख से व्याकुल, ग्रहण करो शत्रु मेरे,
  शिव की माया धूम्र का शरीर, हरो सब कष्ट मेरे,
  दुहाई महादेव की ।।

          मन्त्र का जाप समाप्त होने के बाद समस्त जाप माँ धूमावती को ही एक आचमनी जल भूमि पर छोड़कर समर्पित कर दें।

          इस प्रकार यह साधना नित्य ११ दिनों तक सम्पन्न करना चाहिए।

          बारहवें दिन हवन करके एक अनार का बलि देना है। हवन में मन्त्र से १०८ बार आहुति देना चाहिए। हवन सामग्री में सिर्फ घी का प्रयोग करे।

          यह मन्त्र अत्यन्त तीव्र है। इसका प्रभाव शीघ्र ही देखने को मिलता है।

          आपकी साधना सफल हो और आपकी मनोकामना पूर्ण हो! मैं सद्गुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्दजी के आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

           इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश ।।।


बुधवार, 13 जून 2018

तीव्र इच्छापूर्ति धूमावती साधना


तीव्र इच्छापूर्ति धूमावती साधना

           
          माँ भगवती धूमावती जयन्ती निकट ही है। यह २० जून २०१८ को आ रही है। आप सभी को धूमावती जयन्ती की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          महाविद्या धूमावती उग्रशक्ति है। भगवान शिव माँ भगवती धूमावती में धूम्र रूप में विराजमान है। विश्व की अमांगल्यपूर्ण अवस्था की अधिष्ठात्री के रूप में यह भगवती विवर्णा, चंचला, गलिताम्बरा, विरलदन्ता, विधवा, मुक्तकेशी, शूर्पहस्ता, काकध्वजिनी, रूक्षनेत्रा, कलहप्रिया आदि विशेषणों से वर्णित है। शत्रुसंहार, दारिद्रय-विध्वंसन एवं भक्त-संरक्षण के लिए यह महादेवी सदैव आराध्य रही हैं।

         नारदपाँचरात्र में माँ धूमावती की उत्पत्ति की कथा वर्णित है, जिसमें कहा गया है कि --- "एक समय भगवान शिव के अंक में विराजमान माँ पार्वती ने शिवाजी से प्रार्थना की कि मुझे भूख लगी है, कुछ खाने के लिए दें। तब शिव ने आश्वासन दिया कि कुछ समय प्रतीक्षा करो, अभी भोजन की व्यवस्था होती है। किन्तु व्यवस्था नहीं हुई और बहुत समय बीत गया। तब भगवती ने स्वयं शिव को ही मुख में रखकर निगल लिया। तदनन्तर भगवती के शरीर से धुआँ निकला और उनका सारा शरीर धुएँ से ढँक गया। भगवान शिव अपनी माया से बाहर आ गए। उन्होंने भगवती पार्वती से कहा कि मैं एक ही पुरुष हूँ और तुम एक ही स्त्री हो। तुमने अपने पति को निगल लिया, अतः तुम विधवा हो गई हो। इसलिए सौभाग्यवती के श्रृंगार को छोड़कर वैधव्य वेष में रहो। तुम्हारा यह शरीर परा भगवती बगला के रूप में विद्यमान था। अब तुम धूमावती महाविद्या के रूप में विश्व में पूजित होकर संसार का कल्याण करोगी।"

          स्वतन्त्र तन्त्र के अनुसार सती ने जब दक्ष यज्ञ में योगाग्नि के द्वारा अपने आपको भस्म कर दिया, तब उस समय उनके जलते शरीर से जो धुआँ उत्पन्न हुआ, उससे भी माँ धूमावती का आविर्भाव माना गया है।

          नारद पाँचरात्र के अनुसार देवी धूमावती ने ही उग्र चण्डिका, उग्र तारा जैसी उग्र तथा भयंकर प्रवृति वाली देवियों को अपने शरीर से प्रकट किया। उग्र स्वभाव, भयंकरता, क्रूरता इत्यादि देवी धूमावती ने ही अन्य देवियों को प्रदान किया। देवी की ध्वनि, हजारों गीदड़ों के एक साथ चिल्लाने जैसी हैं, जो महान भयदायक हैं। देवी ने क्रोधवश अपने पति भगवान शिव का भक्षण लिया था। अतः देवी का सम्बन्ध अतृप्त क्षुधा (भूख) से भी हैं, देवी सर्वदा अतृप्त एवं भूखी है, परिणामस्वरूप देवी दुष्ट दैत्यों के माँस का भक्षण करती हैं, परन्तु इनकी क्षुधा का निवारण नहीं हो पाता हैं।

          देवी धूमावती की उपासना विपत्ति नाश, स्थिर रोग निवारण, युद्ध विजय एवं घोर कर्म मारण, उच्चाटन इत्यादि में की जाती हैं। देवी के कोप से शोक, कलह, क्षुधा, तृष्णा मनुष्य के जीवन से कभी जाती ही नहीं हैं, स्थिर रहती हैं। देवी, प्रसन्न होने पर रोग तथा शोक दोनों का विनाश कर देती है और कुपित होने पर समस्त भोग एवं कामनाओं का नाश कर देती हैं। आगम ग्रन्थों के अनुसार, अभाव, संकट, कलह, रोग इत्यादि को दूर रखने हेतु देवी के आराधना की जाती हैं।

         ज्येष्ठा देवी, धूम्रवर्णा, धूमावती आदि नामों से प्रसिद्घ इस भगवती के अनेक उपासक हुए हैं, जिनमें अर्धनारीश्वर, नारसिंह, स्कन्द, क्षपणक, पिप्पलाद, बौधायन आदि प्रमुख है। इनका एक मन्त्र इस प्रकार है --- ॐ धूं धूं धूं धूमावती स्वाहा।

             यह धूमावती साधना का एक सफल, अनुभूत और तीव्र प्रभावयुक्त प्रयोग है। यह केवल एक दिन की ही साधना है और आपकी जो भी इच्छा हो, वह इच्छा माँ भगवती धूमावती अवश्य ही पूरी करती है। विषम परिस्थिति में आप यह साधना नौ दिन तक जारी रखें।

            वैसे तो एक ही दिन बहुत है, इस साधना के लिए परन्तु हमारे अन्दर ऊर्जा के कमी के कारण कभी-कभी हमारे द्वारा की गई साधना सफल नहीं होती है। फिर भी इसमें ऐसा नहीं है, माँ भगवती अवश्य ही मनोकामना पूरी करती है।

साधना विधान :----------

           यह साधना धूमावती जयन्ती को सम्पन्न करे अथवा इसे किसी भी नवरात्रि काल में भी किया जा सकता है। साथ ही इसे किसी भी शनिवार, मंगलवार या रविवार किसी भी दिन किया जा सकता है।  समय होगा रात्रि का महानिशाकाल अर्थात यह साधना रात्रि को दस बजे आरम्भ करके प्रातः लगभग तीन या चार बजे तक समाप्त करनी चाहिए।

          साधना के लिए स्थान ऐसा हो, जहाँ आपको कोई असुविधा ना हो और कोई आपको व्यर्थ परेशान न करे। आपके आसन एवं वस्त्र लाल होने चाहिए और दिशा उत्तर रहे या आप सुविधा के अनुसार सुनिश्चित कर सकते हैं।

           यह साधना आपको पद्मासन अथवा सिद्धासन बैठकर सम्पन्न करनी चाहिए। माला रुद्राक्ष की होनी आवश्यक है और इस साधना में आपको ११ माला जाप करना है।

           साधना आरम्भ करने से पहले सामान्य गुरुपूजन एवं गणेश पूजन अवश्य करें। गुरुमन्त्र का जाप करके गुरुदेवजी से मानसिक रूप से आज्ञा लेकर ही साधना करनी चाहिए।

           साधना से पूर्व साधक को चाहिए कि वह संकल्प अवश्य करें। संकल्प में साधक अपनी उस मनोकामना उच्चारण अवश्य करें, जिसकी पूर्ति के निमित्त वह साधना कर रहा है।

           अपने सामने गोबर के उपले जलाकर उसमें गुग्गल डालकर धुआँ करते रहे। साधना के वक्त लगातार धुआँ होते रहना अवश्यक है।

साबर मन्त्र :----------

।। आई आई धूमावती माई,                                                                                       सुहाग छेड़े कोन कुले जाई                                             
धुआँ होय धूँ-धूँ कोरे,                                                  
आमार काज ना कोरले                                               

शिबेर जोटा खोसे भुमिते पोड़े ।।

AAYEE AAYEE DHOOMAWATI MAAYEE
SUHAAG CHHEDE KON KULE JAAYEE
DHUAAN HOY DHOON-DHOON KORE
AAMAAR KAAJ NAA KORLE
SHIBER JOTA KHOSE BHUMITE PODE.

          मन्त्र जाप समाप्ति के पश्चात साधक एक आचमनी जल भूमि पर छोड़कर समस्त जाप माँ भगवती धूम्रवर्णा धूमावती को ही समर्पित कर दें।

          यह बांग्ला भाषा का साबर मन्त्र है, जो कि अत्यन्त तीव्र एवं शीघ्र प्रभावकारी कामनापूर्ति मन्त्र है। इस साधना को सम्पन्न करने से साधक की संकल्पित मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

          आपकी साधना सफल हो और आपकी मनोकामना पूर्ण हो! मैं सद्गुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए मंगल कामना करता हूँ।

          इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल गुरूजी को आदेश आदेश आदेश।।।