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शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

सुदर्शन चक्र रक्षा साधना

सुदर्शन चक्र रक्षा साधना




                रक्षा-बन्धन (राखी) पर्व निकट ही है। यह २६ अगस्त २०१८ को आ रहा है। आप सभी को राखी पर्व की अग्रिम रूप से बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ!

                प्राचीन मुख्य १०८ विज्ञान में कई ऐसे विज्ञान हैजिसके बारे में सामान्यजन को पता ही नहीं है। ऐसा ही एक विज्ञान हैजो कि प्रचलन में रहा थावह था युद्ध विज्ञान। इस विज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति को अपनी शक्ति और सामर्थ्य बढ़ा कर किस प्रकार से आत्मरक्षण तथा पर-जन-रक्षण कर सकेइसकी शिक्षा दी जाती थी। साथ ही साथ शस्त्रों की तालीम भी दी जाती थीजो कि सहायक रूप में शक्ति संचार का कार्य करते हैं। इस विज्ञान के अन्तर्गत यह भी बताया जाता था कि व्यक्ति किस प्रकार से भूमि तथा वायु में निहित शक्ति को संचारित कर के युद्ध कर सकता है।

               इस विज्ञान का ही बौद्ध काल में विस्तारण हुआजिसमें कई प्रकार के नवीन अन्वेषण कर मार्शलआर्ट आदि विविध ज्ञान कई देशों में अमल में आया। इससे यह जाना जा सकता है कि उस समय जीव तथा भौतिक विज्ञान का विशेषतम ज्ञान हमारे ऋषियों के पास था। जब इसी विज्ञान को तन्त्र पक्ष से जोड़ा गया तो कई तन्त्र पद्धतियाँ अमल में आईजिनका उद्देश्य युद्ध के दौरान विजयश्री के लिए किया जा सके। सैन्य स्तम्भनसैन्य मारणराज्य मोहिनीराजा वशीकरण जैसे प्रयोगों को अमल में लाया गया। साथ ही साथ सबसे अत्यधिक महत्वपूर्णजिन साधनाओं का प्रचार हुआवह थी अस्त्र साधनाएँ।

               हमारे शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि विविध अस्त्रों का प्रयोग युद्ध में बराबर होता थाअग्निपावकावरुणनागअघोरब्रह्मा आदि विभिन्न अस्त्रों के बारे में विवरण मिलता है। इन सभी अस्त्रों को साधनाओं के माध्यम से आज भी प्राप्त किया जा सकता है। देवी-देवताओं को सिद्ध कर उनसे अस्त्र प्राप्त करने के विवरण हमारे ग्रन्थों में मिलते है। इसी प्रकार विष्णु भगवान का अस्त्र सुदर्शन चक्र है। इन अस्त्रों को प्राप्त करने की साधना अत्यधिक कठोर तथा श्रमसाध्य है तथा इसमें कई साल का समय साधक को लग सकता है। लेकिन इन अस्त्रों से सम्बन्धित कई विविध लघु प्रयोग भी हैजिससे देवी देवता प्रसन्न होकर अपने अस्त्रों को साधक के पास भेज कर उनका रक्षण करने की आज्ञा देते हैं। लेकिन यह दुष्कर प्रयोग बहुत ही मुश्किल से प्राप्त होते हैंयदा कदा मन्त्रों का विवरण भी मिल जाएलेकिन सम्बन्धित प्रक्रियाएँ मिलना मुश्किल ही है।

                 सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का प्रमुख शस्त्र हैइस चक्र से माध्यम से भगवान ने बहुत से दुष्टों का विनाश किया है। इस चक्र की खास बात यह है कि यह चलाने के बाद अपने लक्ष्य पर पहुंचकर वापिस आ जाता है। यह चक्र कभी भी नष्ट नहीं होता है। इस शस्त्र में अपार ऊर्जा है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। 

                इस दिव्य चक्र की उत्पत्ति को लेकर कई कथाएँ सामने आती हैंकुछ लोगों का मानना है कि ब्रह्माविष्णुमहेशबृहस्पति ने अपनी ऊर्जा एकत्रित कर के इसकी उत्पत्ति की है। यह भी माना जाता है कि यह चक्र भगवान विष्णु ने भगवान शिव की आराधना कर के प्राप्त किया है। लोग यह भी कहते हैं कि महाभारत काल में अग्निदेव ने श्री कृष्ण को यह चक्र दिया था जिससे अनेकों असुरों का संहार हुआ था।

             सुदर्शन चक्र की सनातन हिन्दू धर्म में बहुत मान्यता हैजैसे वक़्तसूर्य और ज़िन्दगी कभी रुकती नहीं हैंवैसे ही इसका भी कोई अन्त नहीं कर सकता। यह परमसत्य का प्रतीक है। शिव पुराण के अनुसार साक्षात आदि शक्ति सुदर्शन चक्र में वास करती हैं। 

             सद्गुरुदेव ने अपने कई संन्यासी शिष्यों को इन प्रक्रियाओं का ज्ञान दिया है। यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे वरिष्ठ भाई-बहिनों के पास इस प्रकार की साधनाएँ सुरक्षित हैं और वे इस गूढ़ ज्ञान से सम्पन्न है। सद्गुरुदेव की कृपा से एक प्रयोग जो कि सुदर्शन चक्र से सम्बन्धित हैवह में आप सब के मध्य रखना चाहूँगा।

साधना विधान :-----------

           चूँकि यह साधना साधक की सुरक्षा से सम्बन्धित है। अतः आप इसे रक्षा-बन्धन (राखी) पर्व से आरम्भ करें। यदि यह सम्भव न हो तो इस साधना को किसी भी शुभ दिन से शुरू किया जा सकता है।

          रात्रिकाल में ११ बजे के बाद साधक स्नान कर के सफ़ेद वस्त्रों को धारण कर सफ़ेद आसन पर बैठे और सामान्य गुरुपूजन करके गुरुमन्त्र की चार माला जाप करें। फिर सद्गुरुदेवजी से सुदर्शन चक्र साधना सम्पन्न करने हेतु मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लेकर उनसे साधना की सफलता के लिए निवेदन करें।

          इसके बाद भगवान गणपतिजी का स्मरण कर किसी भी गणपति मन्त्र का एक माला जाप करें और उनसे साधना की निर्विघ्न पूर्णता के लिए प्रार्थना करें।

          इस साधना में साधक को कुल ११,००० मन्त्र जाप करना है। साधक अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिनों का चयन कर अपना मन्त्र जाप पूरा कर लेंलेकिन मन्त्र जाप की संख्या रोज़ एक समान और नियमित रहे। साधक चाहे तो एक दिन में भी मन्त्र जाप पूरा कर सकता है।

          तत्पश्चात साधक को साधना के पहले दिन संकल्प अवश्य लेना चाहिए। दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि मैं अमुक नाम का साधक गोत्र अमुक आज से सुदर्शन चक्र साधना शुरू कर रहा हूँ। मैं नित्य ७ दिनों तक १५ माला मन्त्र जाप सम्पन्न करूँगा। हेसद्गुरुदेवजी! आपकी कृपा से मेरी यह साधना सफल होजिससे कि मुझे और मेरे परिवार को सम्पूर्ण रूप से सुरक्षा प्राप्त हो सके और जीवन पूरी तरह चिन्तामुक्त हो सके।

          आप चाहे तो ११ माला प्रतिदिन के हिसाब से इस साधना को ११ दिनों में भी सम्पन्न कर सकते हैं। लेकिन संकल्प में फिर आप वैसा ही उच्चारित करें।

           इसके बाद साधक हाथ जोड़कर भगवान सुदर्शन चक्र का निम्नानुसार ध्यान करे -----

  सुदर्शनं महावेगं गोविन्दस्य प्रियायुधम्‚
ज्वलत्पावकसङ्काशं सर्वशत्रुविनाशनम्।
कृष्णप्राप्तिकरं शश्वद्भक्तानां भयभञ्जनम्‚
सङ्ग्रामे जयदं तस्माद्ध्यायेद्देवं सुदर्शनम्॥

          फिर रुद्राक्ष माला से साधक निम्न मन्त्र का जाप करें -----

मन्त्र :-----------

।। ॐ सुदर्शन चक्राय शीघ्र आगच्छ मम् सर्वत्र रक्षय-रक्षय स्वाहा ।।

OM SUDARSHAN CHAKRAAY SHEEGHRA AAGACHCHH MAM SARVATRA RAKSHAY-RAKSHAY SWAAHA.

          मन्त्र जाप के पश्चात एक आचमनी जल भूमि पर छोड़कर समस्त जाप समर्पित कर दें। 
          इस प्रकार यह साधना आप नित्य ७ अथवा ११ दिनों तक सम्पन्न करें। साधना समाप्ति के बाद साधक माला को धारण किए रखे तथा आगामी दिनों में ग्रहणकाल के समय इस मन्त्र की ११ माला जाप फिर से करे और शहद से अग्नि में १००८ आहुतियाँ इसी मन्त्र से अर्पित करे।

          यह साधक का सौभाग्य होता है कि उसे साधना काल के दौरान  सुदर्शन चक्र के दर्शन हो जाए। यदि ऐसा होता है तो साधक को चाहिए कि वह विनीत भाव से प्रणाम कर सुदर्शन चक्र से रक्षण के लिए प्रार्थना करे।

          इसके बाद सुदर्शन चक्र साधक के आसपास अप्रत्यक्ष रूप में रहता है तथा सर्व रूप से शत्रु तथा अनेक बाधाओं से व्यक्ति का रक्षण करता ही रहता है। साधक का अहित करने का सामर्थ्य उसके शत्रुओं में रहता ही नहीं है।

          आपकी साधना सफल हो और आपकी मनोकामना पूर्ण हो! मैं सद्गुरुदेव भगवानजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।       

         
इसी कामना के साथ 

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश।।।

बुधवार, 1 अगस्त 2018

तन्त्र-बाधा निवारण प्रयोग

तन्त्र-बाधा निवारण प्रयोग


     
        ॐ नित्यं शुद्धं निराभासं निराकारं निरंजनम्।
        नित्यबोधं चिदानन्दम् गुरूम् ब्रह्म नमाम्यहम्।।

        गुरु का जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि बिना गुरु के जीवन बिना माँझी के नाव और बिना लगाम के घोड़े जैसा है। अर्थात फिर जीवन सिर्फ खींचने के अलावा और कुछ नहीं है।

        क्योंकि यदि जीवन है तो सुख भी होंगे और दुःख भी होंगे। साधारण जीवन उनका होता है, जिन्हें कुछ नहीं पता नहीं रहता कि आखिर यह दुःख क्यों अचानक हमारे जीवन में आ रहे हैं? क्यों अचानक अच्छी सुखमय जिन्दगी नर्क बनती चली जा रही है?

        और फिर ऐसे अनेक प्रश्न उभरते हैं दिमाग में, और हम उलझते जाते हैं ऐसे अनेक झंझावातों में, क्योंकि गुरु नहीं है ना जीवन में जो उबार सके ऐसे कष्टों से, बता सके कि तन्त्र क्या होता है? और क्या होती है तन्त्र बाधा? मैंने अपने जीवन में ऐसे अनेक परिवार देखे हैं, जो बेचारे तन्त्र-बाधा के चलते मिटते चले गए, बर्बाद होते चले गए।

         तन्त्र-बाधा अत्यन्त ही दुखदायी है किसी के भी जीवन में, क्योंकि उसके बाद की ज़िन्दगी बड़ी कष्टदायी और नारकीय हो जाती है। जरा सोचिए, कि एक तन्त्र प्रयोग के बाद का जीवन कैसा होता है?

         जब अचानक गृह का मुखिया जिसके सहारे पूरा परिवार पल रहा हो, अचानक रोगग्रस्त होकर बिस्तर से लग जाए, घर में बेटी की शादी बार-बार टूट जाए, नौकरी योग्य पुत्र की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लग जाए, रुपये पैसे की आवक रुक जाए, सामाजिक प्रतिष्ठा दाँव पर लगी हो तो?

         तन्त्र प्रयोग करना एक अत्यन्त सरल प्रक्रिया है, किन्तु इसके बाद के जो परिणाम होते हैं, वे अत्यन्त भयानक होते हैं, क्योंकि इससे गुजरने वाला व्यक्ति या परिवार का जीवन नर्क की भाँति हो जाता है जो असहनीय होता है।

         कुछ ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं कभी-कभी -- जैसे अचानक घर मे भयावह वातावरण बन जाए, बच्चे अचानक डर कर बीमार रहने लगें, घर में कलह की स्थिति रहने लगे और एक अजीब-सा डर रहने लगे, तब समझना चाहिए कि निश्चित ही तन्त्र-बाधा हुई है।
  
    किन्तु क्या इसका कोई उपाय है?
 
         वैसे आप लोग अक्सर पढ़ते भी हैं कि तन्त्र-बाधा निवारण  दीक्षा, तन्त्र बाधा निवारण प्रयोग आदि। तान्त्रिक प्रयोग कोई भी कर सकता है, परन्तु उसके परिणाम व्यक्ति को गहराई से और पीड़ादायक भोगने पड़ते हैं। एक प्रकार से देखा जाए तो पूरी ज़िन्दगी अस्त-व्यस्त हो जाती है। हमला करने या तान्त्रिक प्रयोग करने की विद्या सीखने में बहुत साधना या मेहनत नहीं करना पड़ती है, परन्तु तान्त्रिक प्रयोग यदि हो गया तो उसे दूर करने के लिए कठिन साधना या सिद्धि की और अनुभवी व्यक्ति की जरूरत पड़ती ही है।

        चूँकि अभी हमारे समक्ष अत्यन्त विशिष्ट समय का आगमन हो रहा है, जबकि हम ऐसी ही किसी भी समस्या से ना केवल मुक्ति पा सकते हैं, अपितु अपने जीवन को ऐसी आने वाली समस्या से सुरक्षित भी कर सकते हैं। वह समय है सूर्य ग्रहण का,  है ना!  यह सूर्यग्रहण  ११ अगस्त  २०१८  को  घटित  होने  जा रहा है।

         सूर्य ग्रहण अर्थात जीवन से किसी भी ग्रहण को दूर कर प्रकाशित करने का समय। ग्रहणकाल मे की गई कोई भी साधना अत्यन्त तीव्रता से फलित होती है।  खगोल शास्त्रियों के अनुसार जब पृथ्वी और चन्द्रमा सूर्य की परिक्रमा करते हुए एक ही रेखा पर आ जाते हैं अर्थात् जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा आ जाता है तो उस काल खण्ड के समय सूर्य की किरणें पृथ्वी पर नहीं पहुँच पाती और पृथ्वीवासी को सूर्य का उतना भाग कटा हुआ दिखाई देता है,  उस समय (अवधि) को सोलर इकलिप्स या सूर्यग्रहण कहा जाता है।

         उच्चकोटि के साधक तो कई माह पूर्व से ही सूर्यग्रहण की प्रतीक्षा करते रहते हैं, क्योंकि सूर्यग्रहण में किया गया एक भी मन्त्र जाप १०० मन्त्र जापों के बराबर होता है और साधना में हुई त्रुटि या न्यूनता का प्रभाव शून्यवत् होता है। ऐसे सिद्धिप्रद दिव्य क्षणों में साधना सम्पन्न करने का विचार साधक के मानस में दैवीय प्रेरणा से ही बन पाता है।

         सूर्यग्रहण का प्रभाव चन्द्रग्रहण से कई गुना अधिक होता है, क्योंकि चन्द्रमा की रश्मियाँ अपनी स्वयं की नहीं होती, अपितु वह तो सूर्य के प्रतिबिम्ब के कारण ही चमकता प्रतीत होता है। इसलिए चन्द्रग्रहण के ठीक एक पक्ष बाद आने वाले इस सूर्यग्रहण पर प्रमाद वश, आलस्य वश या अन्य किसी कारण से कदापि भी इस साधना को सम्पन्न करने से नहीं चूकना चाहिए।

         यदि ऐसी स्थिति है तो भी और नहीं हैं तो भी, ताकि भविष्य को भी सुरक्षित कर सकें, कि ऐसा प्रयोग हो न सके या ऐसी स्थिति ही न बन पाए, तो भी हमें इस प्रयोग को करना ही चाहिए, हैं ना! क्योंकि मौका भी है और हमारी परम्परा भी, क्योंकि निखिल परम्परा के अनुसार हम कोई भी साधनात्मक अवसर को छोड़ते ही नहीं हैं।

साधना विधि :------------ 

          यह  साधना  आप  आने  वाले  सूर्यग्रहण  काल  में  सम्पन्न  करें।  ग्रहणकाल अपने  आप  में  एक  स्वयं  सिद्ध  मुहूर्त  होता है।  चूँकि ग्रहणकाल में विशेष पूजा नहीं की जाती,  अतः ग्रहणकाल में किसी भी विग्रह, यन्त्र या मूर्ति का हाथ से स्पर्श ना करें।

          इसके आवश्यक सामग्री हैं - एक नारियल, कुमकुम, काजल, काली हकीक माला या मूँगा माला और तीन दीये, जो कि सरसों के तेल के हों तो अति उत्तम या किसी भी प्रकार का तेल हो सकता है।

          स्नान कर दक्षिण मुख होकर आसन पर बैठ जाएं और मानसिक गुरु पूजन कर ४, ११ या १६ माला गुरुमन्त्र की जाप करें तथा गुरुमन्त्र समर्पित कर सद्गुरुदेवजी से आज्ञा लें और आशीर्वाद प्राप्त करें, फिर संकल्प लें। 
   
          अब अपने सामने भूमि पर कुमकुम को जल से गीला कर अधोमुखी त्रिकोण का निर्माण करें और त्रिकोण के तीनों कोनों पर तीन सरसों तेल के दीपक प्रज्वलित कर लें। उसके बाद नारियल को उस पर ऐसे स्थापित करें कि उसके पूँछ ऊपर की ओर हो।
          फिर काजल से निम्न मन्त्र बोलते हुए सात बिन्दियाँ नारियल पर लगावें -----

मन्त्र :-----------

 ।। ॐ ऐं ह्रीं मम समस्त तन्त्र दोष निवृत्तये ह्रीं ऐं फट् ।।

OM AING HREENG MAM SAMAST TANTRA DOSH NIVRITTYE HREENG AING PHAT.

          अब काली हकीक माला अथवा रुद्राक्ष या मूँगे की माला से इसी मन्त्र की ११ माला जाप करें।

          और इसके पश्चात गुरु मन्त्र की चार माला जाप कर सद्गुरुदेवजी से प्रार्थना करें कि यह साधना सफल हो और हमारे जीवन से तन्त्र-बाधा दूर हो और हम सदैव सुरक्षित रहें।

          साधना समाप्ति के बाद या दूसरे दिन नारियल को किसी सुनसान स्थान पर विसर्जित कर दें।

                     आपकी साधना सफल हो और आपकी मनोकामना पूर्ण हो! मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।  

                     
इसी कामना के साथ!

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश।।


रविवार, 30 जुलाई 2017

रक्षा बन्धन प्रयोग

रक्षा बन्धन प्रयोग


                     रक्षा बन्धन अर्थात राखी पर्व समीप ही है। यह पर्व इस वर्ष ७ अगस्त २०१७ को आ रहा है। आप सभी को रक्षा बन्धन पर्व की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ।

          रक्षा बन्धन का पर्व आते ही सभी व्यक्तियों के हृदय में एक भावनात्मक सम्बन्ध उत्पन्न हो जाता है। रक्षा बन्धन का पर्व भारत में अत्यधिक महत्व रखता है, इस पर्व का अर्थ अन्य पर्वों से हटकर है। न तो यह किसी मठ से सम्बन्धित है और न ही किसी विशेष सम्प्रदाय से, अपितु सभी धर्मों में इस पर्व को अति सम्मानजनक स्थान प्राप्त है और सभी धर्मों में इसको अत्यधिक उल्लास के साथ सम्पन्न किया जाता है। इस पर्व का उद्देश्य है - "रक्षा"। रक्षा, इस शब्द के पीछे उनका उद्देश्य यही था कि व्यक्ति अपनी रक्षा स्वयं करें, सामाजिक रूप से भी तथा आर्थिक रूप से भी।

          रक्षा बन्धन के पर्व पर बहिनें अपने भाई के हाथ में रक्षा सूत्र बाँधती हैं, जिसका अर्थ है कि भाई अपनी बहिन की मान, मर्यादा, यश, प्रतिष्ठा की रक्षा करेगा और बहिनें अपने भाई की लम्बी आयु तथा श्रेष्ठ जीवन एवं सभी तरह से सम्पन्न जीवन की कामना करती है। आज के आधुनिक युग में तो रक्षा बन्धन की मात्र यही परिभाषा कह गई है।

          जब भी बहिन अपने भाई के हाथ में राखी बाँधती है तो भाई स्वयं को उसका रक्षक मान बैठता है, परन्तु -----
     ---क्या वह इतना सक्षम होता है कि हर मुसीबत से अपनी तथा उसके जीवन की रक्षा कर सके?
    ---यदि वह इतना सक्षम नहीं होता तो इस पर्व का अर्थ क्या है?
    --- फिर इसका मूल उद्देश्य क्या है?

          हमारे महर्षियों ने इस पर्व की रचना मात्र इसी उद्देश्य से तो नहीं की होगी, बल्कि इसकी रचना के पीछे उनका कोई विशेष उद्देश्य रहा होगा। हम लोग इसका मूल उद्देश्य भूलकर इसे केवल धागों का ही बन्धन मान बैठे हैं। इस पर्व की रचना के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य यह रहा होगा कि व्यक्ति स्वयं के जीवन की सम्पूर्ण सुरक्षा के साथ ही साथ अपने सम्बन्धियों के जीवन की भी सुरक्षा कर सके।

          इस विशिष्ट दिवस पर जो कि रक्षा बन्धन के नाम से सुशोभित है, ग्रह-नक्षत्रों का एक विशेष सम्बन्ध स्थापित होता है, जिसके कारण दिव्य शक्तियों से युक्त रश्मियाँ इस दिवस विशेष में पृथ्वी को आच्छादित कर लेती हैं। इसी कारण ऋषियों ने इस दिवस को एक पावन पर्व के रूप में स्थापित किया, क्योंकि इस विशिष्ट मुहूर्त में यदि अपने इष्ट की अथवा अपने गुरु द्वारा निर्देशित साधना की जाए तो वर्ष पर्यन्त सुरक्षा का उपाय प्राप्त होता है।

          पुरातन काल की तरह आधुनिक काल में भी व्यक्ति अपनी शारीरिक, आर्थिक व सामाजिक रूप से सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए प्रयत्न करता रहता है और अपने जीवन की सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए उपाय ढूँढता रहता है। इसके लिए वह समस्त प्रकार की आपदाओं को समाप्त करना चाहता है और भौतिक संसाधनों के साथ ही साथ दैवीय सहायता भी प्राप्त करने का प्रयास करता है। इसी कारण वह व्रत-उपवास रखता है, मन्दिरों में जाता है, पूजा-पाठ तथा साधनाएँ सम्पन्न करता है।

          जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है कि रक्षा बन्धन की रचना व्यक्ति की असुरक्षा की भावना को समाप्त करने के लिए ही की गई है। इस विशेष दिवस पर व्यक्ति साधना सम्पन्न करके अपने जीवन को दैवीय सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

         अपने जीवन को सुरक्षा प्रदान करना व्यक्ति का धर्म ही है। यदि व्यक्ति जीवन में अपने आपको सुरक्षित अनुभव नहीं करता है तो स्वाभाविक रूप से उसकी आधी ऊर्जा उन भयास्पद परिस्थितियों से जूझने में ही समाप्त हो जाती है। भयग्रस्त रहने के कारण व्यक्ति का व्यक्तित्व शनैः-शनैः समाप्त होने लगता है।

          यदि भयातुर व्यक्ति में सुरक्षा की भावना उत्पन्न हो जाए तो वह साहस कर उन परिस्थितियों से भी जूझ जाता है, जिनके विचार से भी कभी उसकी शक्ति क्षीण हो जाती थी।

          व्यक्ति सुरक्षा के प्रति कितना अधिक सचेष्ट रहता है, इसका उदाहरण महाभारत जैसे ग्रन्थ में स्पष्टता से देखने को मिलता है। महाभारत युद्ध का निर्धारण हो चुका था, कौरव और पाण्डव अपनी-अपनी रणनीति तैयार कर रहे थे। कौरवों की ओर महान योद्धा भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य आदि थे, जबकि पाण्डवों की ओर कुछ गिने-चुने व्यक्ति ही थे। श्रीकृष्ण पाण्डवों के पक्ष में थे और वे उन्हें विजय दिलाने के लिए प्रयत्नशील थे। युद्ध के आरम्भ में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उसकी सुरक्षा के लिए एक साधना सम्पन्न करवाई थी, जिसके कारण उन्हें युद्ध में निरन्तर दैवीय सहायता प्राप्त होती रही और वे युद्ध में विजयी हुए।

          साधना द्वारा अपने आपको सुरक्षित करने का विधान अति प्राचीन तथा प्रामाणिक है।

साधना विधान :-----------

          इस साधना को आप रक्षा बन्धन के दिन अथवा किसी भी मास की पूर्णिमा को प्रारम्भ कर सकते हैं। इस साधना में आवश्यक सामग्री "सर्व रक्षाकारी यन्त्र" तथा "सफ़ेद हकीक माला" है।

          यदि साधना सामग्री उपलब्ध न हो तो भी आप इस साधना को पारद शिवलिंग पर सम्पन्न कर सकते हैं। यह साधना ग्यारह दिवसीय है और किसी भी समय सम्पन्न की जा सकती है।

          सर्वप्रथम साधक स्नान करके पीले वस्त्र धारण कर लाल अथवा पीले आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने बाजोट पर पीला या सफ़ेद वस्त्र  बिछाकर उसपर पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का चित्र स्थापित करें। चित्र सामने किसी ताम्रपात्र में यन्त्र अथवा पारद शिवलिंग स्थापित कर दें। फिर घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर धूप-अगरबत्ती जला दें।

          इसके बाद पहले सामान्य गुरुपूजन करके गुरुमन्त्र की कम से कम चार माला जाप करें। फिर सद्गुरुदेवजी से रक्षा बन्धन प्रयोग सम्पन्न करने की अनुमति लें और उनसे साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

          तत्पश्चात संक्षिप्त गणपति पूजन सम्पन्न करें और एक माला गणेश मन्त्र का जाप करें। फिर भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

          इसके बाद साधना के पहले दिन साधक को संकल्प अवश्य लेना चाहिए।

          तदुपरान्त साधक यन्त्र अथवा शिवलिंग का पूजन कुमकुम, पुष्प तथा अक्षत से करें और नैवेद्य अर्पित करें। यन्त्र या शिवलिंग के समक्ष एक जलपात्र रखें।

          फिर साधक सफ़ेद हकीक माला अथवा रुद्राक्ष माला से निम्न मन्त्र की नित्य २१ माला जाप करें -----

मन्त्र :----------
          ।। ॐ रं रुद्राय रं ॐ फट् ।।

                    OM RAM RUDRAAY RAM OM PHAT.

          मन्त्र जाप समाप्त होने के बाद जलपात्र का थोड़ा-सा जल लेकर स्वयं पर छिड़क दें तथा बचा हुआ जल किसी पौधे की जड़ में डाल दें।

         इस प्रकार यह साधना क्रम नित्य ग्यारह दिनों तक सम्पन्न करें।

         साधना समाप्ति के बाद यन्त्र तथा माला को किसी रविवार को दिन नदी में प्रवाहित कर दें। यदि आपने शिवलिंग पर साधना सम्पन्न की है, तो उस शिवलिंग को पूजा स्थान में स्थापित कर दें।

          आपकी साधना निखिल कृपा से सफल हो। मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

                      इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश।