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शनिवार, 2 जुलाई 2022

गुरु आत्म-स्थापन साधना

 गुरु आत्म-स्थापन साधना

      

           उच्चकोटि के साधकों एवं शिष्यों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व गुरुपूर्णिमा समीप ही है। इस बार गुरुपूर्णिमा १३ जुलाई २०२२ को आ रही है। आप सभी को गुरुपूर्णिमा पर्व की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ।

          शिष्य जब समर्पण भाव में आ जाता है और वह गुरु के साथ एकाकार होने के लिए मन-मस्तिष्क एवं हृदय से दृढ़ हो जाता है, तो गुरु शिष्य के साथ आत्मलीन होकर उसे अपना सम्पूर्ण प्यार उड़ेल देते हैं।

          परम पूज्य सद्गुरुदेव डॉ. नारायणदत्त श्रीमालीजी, जो हम सबके सद्गुरुदेव हैं एवं हमारे प्राणप्रिय हैं। उन्होंने अपनी क्रिया द्वारा यह भौतिक देह भले ही छोड़ दी हो, वे सिद्धाश्रम में पूज्य श्रीनिखिलेश्वरानन्द स्वरूप में विराजमान हैं और आत्मिक रूप से हम सबके मध्य ही तो स्थित हैं।

          मात्र शिष्यों के कल्याण के लिए ही वे आए और उनकी नज़र में प्रत्येक शिष्य समान ही रहा, चाहे वह एक वर्ष से जुड़ा हो या दस वर्ष से या दस दिन से या अभी भी जुड़ने का मानस बना रहा हो, तभी तो करुणा से वशीभूत होकर वे यह साधना दे गए, जिसको सम्पन्न कर आप हर समय गुरु की सान्निध्यता अनुभव कर सकते हैं।

          एकलव्य गुरु द्रोण के आश्रम से काफी दूर जंगलों में रहता था। उसने वहाँ गुरु की मूर्ति स्थापित कर अभ्यास जारी रखा। गुरु द्रोण सदैव उस मूर्ति में प्राण स्वरूप में विराजमान रहते थे और एकलव्य को प्रेरणा दिया करते थे। यह रहस्य केवल एकलव्य और गुरु द्रोण ही जानते थे। सशरीर रूप में कभी सामने न आकर भी एकलव्य को मात्र धनुर्विद्या में ही नहीं, अपितु अपना सर्वस्व ज्ञान देकर पूर्ण कर दिया।

          प्रस्तुत गुरु आत्म-स्थापन साधना पूज्य द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य को दी गई साधना का परिवर्द्धित रूप है, जिससे साधक गुरु-कृपा प्राप्ति के लिए तीव्रता से अग्रसर हो सके और उन्हें गुरुदेव के सानिध्य का अहसास होना प्रारम्भ हो जाए। एकलव्य ने भी साधना के द्वारा ही गुरु द्रोण की सूक्ष्म उपस्थिति को साकार किया था। आवश्यकता है तो मात्र इस साधना को पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास से सम्पन्न करने की।

          अभी तक यह साधना गोपनीय ही रही है, परन्तु अब वर्तमान समय को देखते हुए, शिष्यों की तड़प और बेचैनी का अनुभव करते हुए, उनकी वेदना को समझते हुए ही इस साधना को उजागर किया जा रहा है। 

साधना विधान :------------

          इस साधना को गुरु पूर्णिमा अथवा शुक्लपक्ष के किसी भी गुरुवार अथवा किसी भी मास की २१ तारीख अथवा किसी भी मास के गुरु श्रद्धाञ्जलि समर्पण दिवस (शुक्लपक्ष की नवमी) से प्रारम्भ किया जा सकता है। स्नान आदि से निवृत्त होकर उत्तराभिमुख होकर पूजा स्थल में एक श्वेत वस्त्र बिछाकर सद्गुरुदेवजी का एक चैतन्य चित्र स्थापित करें। चित्र ऐसा हो, जिसे आप स्नान करा सकें, विधिवत पूजन कर सकें, तिलक लगा सकें। ऐसा भव्य चित्र हर समय आपके पूजा स्थान में स्थापित रहे। इस चित्र के साथ ही सिद्धाश्रम चेतनायुक्त गुरु आत्म यन्त्रभी स्थापित करें।

          उसके बाद सद्गुरुदेवजी के ललाट, कान, कण्ठ, हृदय स्थान, नाभि, दोनों भुजाओं पर चन्दन से तिलक करें। यह तिलक बिन्दी स्वरूप हो, तत्पश्चात गुरु चित्र पर सुगन्धित माल्य अर्पण करें। तदनन्तर निम्न मन्त्र का १०५ बार उच्चारण करते हुए गुरु चित्र और यन्त्र पर अक्षत चढ़ाते हुए गुरुदेव का आवाहन करें -------

आवाहयामि आत्म स्वरूपम्, आवाहयामि प्राण स्वरूपम्।

आवाहयामि मम देह चिन्त्यं, गुरुत्वं शरण्यं गुरुत्वं शरण्यम्॥

          अब आप अपने सामने एक कटोरी में चन्दन लेकर उसे अपने शरीर के अंगों (ललाट, कान, कण्ठ, हृदय स्थान, नाभि, दोनों भुजाओं) पर लगाएं और निम्न मन्त्र का उच्चारण करें। इन मन्त्रों के उच्चारण के साथ ही गुरुदेव को अपने हृदय स्थान पर विराजमान होने का भाव रखें -------- 

ॐ कूर्माय नमः। ॐ आधार शक्तयै नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ धर्माय नमः। ॐ ज्ञानाय नमः। ॐ सवित्रालाय नमः। ॐ ऐश्वर्याय नमः। ॐ विकारमयकेशरेभ्यो नमः। ॐ पञ्चाशर्णाबीजाद्याकर्णिकायै नमः। ॐ वैराग्याय नमः। अनैश्वर्याय नमः। ॐ अनन्ताय नमः। ॐ सर्वतत्वात्मकाय नमः। ॐ आनन्दकन्द कन्दाय नमः। ॐ प्रकृतिमयपत्रेभ्यो नमः।

          चूँकि आप दीक्षित शिष्य हैं और नित्य गुरुमन्त्र का जाप करते हैं। अतः मन्त्र जाप से पूर्व जिस माला से गुरुमन्त्र जाप करते हैं, उस माला से गुरुमन्त्र की ४ माला जाप करें। इसके बाद गुरु सिद्धि मालासे २१ माला गुरु आत्मस्थापन मन्त्र का जाप करें -------

गुरु आत्मस्थापन मन्त्र :------------

॥ ॐ ह्रीं क्लीं गुरुत्व आत्म ऐक्यं ह्रीं फट् ॥

OM HREEM KLEEM GURUTVA AATMA AIKYAM HREEM PHAT. 

          यह २१ दिन की साधना है और इसे प्रातःकाल अथवा रात्रि में ही सम्पन्न करना चाहिए। मन्त्र जाप के बाद साधक को दस मिनट शवासन में लेट जाना चाहिए। ऐसा करने से मनोरम प्राकृतिक दृश्य दिखाई दे सकते हैं। इस साधना से अनेक प्रकार के अनुभव होते हैं।

          २१ दिन के बाद माला को जल में प्रवाहित कर दें और यन्त्र को पूजा स्थान में स्थापित कर दें। बाद में भी इस मन्त्र का नित्य १५-२० मिनट तक जाप करने के पश्चात शवासन करें। धीरे-धीरे साधक को गुरुदेव की उपस्थिति का अनुभव होने लगेगा, आपके मन में उमड़ रहे प्रश्नों का उत्तर भी मिलने लगेगा, जीवन में साहस और निडरता आ जाएगी।

          आपकी यह साधना सफल हो! मैं पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी से आप सबके लिए ऐसी कामना करता हूँ।

               इसी कामना के साथ

        ॐ नमो आदेश निखिलजी को आदेश आदेश आदेश।।।

 

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

निखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच साधना


निखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच  साधना


         
           निखिल संन्यास दिवस निकट ही है। यह इस बार २३ नवम्बर २०१८ को आ रहा है। आप सभी को निखिल संन्यास दिवस की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          पूज्यपाद सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्दजी मन्त्र, तन्त्र और साधना के क्षेत्र में प्रामाणिक और चेतनावान व्यक्तित्व माने गए हैं। सूर्य विज्ञान, पारद विज्ञान तथा परा विज्ञान के अद्वितीय ज्ञाता रहे हैं। अपनी तपस्या एवं साधना के बल से किसी के भी दुर्भाग्य की रेखा को सौभाग्य के रूप में बदलने की क्षमता रखते हैं। योग के माध्यम से समस्त ब्रह्माण्ड जिनकी लीला भूमि है,भगवत्पाद सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्दजी ने श्रीकृष्ण के बाद सम्मोहन विज्ञान को सम्पूर्ण रूप से अपने भीतर संजोया है, ऐसे सिद्धाश्रम संस्पर्शित व्यक्तित्व जो वर्तमान में डॉ. नारायणदत्त श्रीमालीजी के रूप में जाने जाते हैं, ने साधारण गृहस्थ की तरह रहकर भौतिक और आध्यात्मिक धरोहरों को साधनाओं के माध्यम से पुनर्जीवित करके समस्त भारतीय ज्ञान और तन्त्र विद्या के वैज्ञानिक स्वरूप को सार्वजनीन किया है। तन्त्र, मन्त्र और ज्योतिष ज्ञान को जो कुछ वर्षों पूर्व समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था, आज उन्होंने उनके सम्मान को पुनः स्थापित करके गौरवान्वित किया है। जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए इन साधनाओं या सिद्धियों का कभी उपयोग नहीं किया, ऐसे सिद्धाश्रम के प्राणश्चेतनायुक्त अद्वितीय व्यक्तित्व का लोकोपकारी अधिकाधिक कार्य अप्रत्यक्ष ही होता है, जो निरन्तर अपने को भीड़ से छुपाकर निर्मल गंगा की तरह सतत क्रियाशील हैं, प्रवाहमान हैं, ऐसे चेतनापुंज व्यक्तित्व के लिए कुछ भी कहना या लिखना समग्र नहीं होगा।

         आज विज्ञान ने समग्र मानव जाति को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ केवल मौत का ही खौफ़ है, भय है, जहाँ से निकलने के लिए कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है, इस घटाटोप अन्धकार में दूर-दूर तक आशा की किरणें दृष्टिगोचर नहीं हो रही है। विज्ञान के चकाचौंध से त्रस्त मानव अपने मार्गदर्शन के लिए ऐसे महामानव की तलाश कर रहा है, जिन की छत्रछाया में यह समस्त विश्व शान्ति और सौहार्द्र का पाठ पढ़ सके। इस भयावह स्थिति में विश्व को विनाश से बचाने के लिए एकमात्र पूज्यपाद गुरुदेव डॉ. नारायणदत्त श्रीमालीजी ही उपयुक्त व्यक्तित्व हैं, जो योग एवं तन्त्र बल से अभय दान दे सकते हैं।

         सिद्धाश्रम में या अन्यत्र अनेक योगियों और सैकड़ों वर्षों की आयु प्राप्त संन्यासियों ने आपकी स्तुति की है, आपके चरित्र का और गुणों का वर्णन किया है, फिर भी उन्होंने स्वीकार किया है कि आपके ज्ञान की गहराइयों को जितना ही ज्यादा जानने का प्रयास करते हैं, उतनी ही गहराई और प्रतीत होती है। महर्षि पुलस्त्य, महर्षि विश्वामित्र ज्ञानानन्द आदि भी आपकी गम्भीरता को नहीं समझ सके। वे सैकड़ों-हजारों वर्षों की साधना करने के बाद भी आप का  सौवां हिस्सा भी अनुभव नहीं कर पाए। वे जितनी और ज्यादा तपस्या करते हैं, उतनी ही आपकी महिमामण्डित विराटता का अनुभव करने लग जाते हैं। तब वे आपके सामने अपने आपको बौना पाते हैं, क्योंकि आप अपने आप में पूर्ण ब्रह्म स्वरूप हैं और पूर्ण ब्रह्म अपने आप में अथाह और असीम है। उसका जितना भी अंश जिसको प्राप्त हो जाता है, वह अपने आप में अद्वितीय बन जाता है, हजार-हजार जन्म लेकर भी आप की पूर्णता को शब्दों में बाँध पाना कठिन है।

         ऐसे महामानव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्दजी के गुणगान में सहस्त्रों स्तोत्र रचे गए। ऋषि, महर्षि तो क्या देवी-देवताओं ने भी स्तोत्र के माध्यम से अपने को सौभाग्यशाली बनाया। ऐसे ही स्तोत्रों में से एक चैतन्य एवं शीघ्र फलदायी स्तोत्र है निखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच, जिसका मात्र पाठ करके ही समस्त समस्याओं व बाधाओं का अन्त किया जा सकता है।

          कभी-कभी व्यक्ति का जीवन बहुत ही असुरक्षित-सा हो जाता है, वह अकारण ही शत्रुओं से घिर जाता है। आज का सामाजिक परिवेश इतना घिनौना और भयास्पद है कि कभी भी आपके साथ कुछ भी घटित हो सकता है। आज तो जीवन इतना सस्ता है, जितना पहले कभी नहीं रहा। कभी हम अकारण ही विवाद में फँस जाते हैं, मुकदमा शुरु हो जाता है, फिर तो जीवन बिलकुल भी निरापद नहीं रह पाता।  इस तरह निरन्तर तनाव की स्थिति बनी रहती है, जो कि मृत्यु से भी अधिक दुष्कर अनुभव होती है। कभी आपके ऊपर तन्त्र प्रयोग हो जाता है, चलता हुआ कारोबार भी रुक जाता है, यह विवाद लड़ते-लड़ते इतना भीषण हो जाता है, जहाँ जीवन को खतरा हो जाता है।  ऐसी स्थितियों से निजात पाने के लिए इस कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह कवच निश्चित रूप से आपको भय या विवाद से मुक्ति प्रदान करेगा।

          यह अद्भुत कवच गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द के तपोबल से प्रदीप्त महामन्त्र है, प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नानोपरानत शुद्ध वस्त्र धारण कर संक्षिप्त गुरु पूजन कर इसका पाठ करने से साधक को सुरक्षा, आनन्द, सौभाग्य तथा गुरुदेव का तेज प्राप्त होता है। दृढ़ निश्चय से युक्त होकर शुद्ध अन्तःकरण से सम्पन्न किया गया इस कवच का विधिवत् अनुष्ठान जीवन की विकटतम परिस्थितियों में भी साधक को विजय प्रदान करने में सक्षम है।

          यदि सम्भव हो तो प्रतिदिन इसका एक पाठ गुरुपूजन एवं गुरुमन्त्र जाप के बाद करना ही चाहिए। किसी भी आपत्ति के आने से पूर्व ही उससे बचने का उपाय करना बुद्धिमानी है। आपत्ति कभी बताकर नहीं आती, इसलिए इस कवच की उपयोगिता आपके लिए है। इसका समुचित पाठ करके आप स्वयं सुरक्षित होइए तथा अपने परिवार को भी सुरक्षित करें। जीवन में विपत्तियों से भागना कायरता है। उनका साहस पूर्वक मुकाबला इन्हीं उपायों से किया जाता है। आप भी ऐसा कर सकते हैं।

कवच साधना विधान :-----------

          यह साधना निखिल जयन्ती, गुरु पूर्णिमा या निखिल संन्यास दिवस से आरम्भ की जा सकती है। इसके अतिरिक्त इसे किसी भी सोमवार, मंगलवार या गुरूवार से भी शुरू किया जा सकता है। यह ११ दिन की साधना है, जिसमें इस कवच के नित्य १०८ पाठ करना आवश्यक है।

          साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में अथवा रात्रि काल में स्नानादि से निवृत्त होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके स्वच्छ आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने बाजोट पर पीला या लाल वस्त्र बिछाकर उस पर पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का चित्र स्थापित कर दें। इसके साथ ही धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर दें।

          सर्वप्रथम भगवान गणपतिजी का स्मरण करके सामान्य पूजन करें। फिर "ॐ वक्रतुण्डाय हुम् फट्" मन्त्र की एक माला जाप करें और भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

          तदुपरान्त पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का स्मरण करके सामान्य पूजन करें। फिर गुरुमन्त्र की कम से कम चार माला जाप करें। फिर सद्गुरुदेवजी से निखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच साधना सम्पन्न करने के लिए मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लें और उनसे साधना की पूर्णता एवं सफलता के लिए निवेदन करें।

          इसके बाद दाहिने हाथ में जल, कुमकुम तथा अक्षत लेकर निम्नानुसार संकल्प करें -----

          ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महाप्रभावस्य द्वितीय परार्धे श्वेतवाराहकल्पे भरतखण्डे पुण्य क्षेत्रे अमुक गोत्रीयः (अपना गोत्र बोलें) अमुक शर्मा हं (अपना नाम बोलें) अस्य श्रीनिखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवचस्य सर्व आपद् विनाशाय पाठं अहं करिष्ये।

          और फिर जल को भूमि पर छोड़ दें।

          तत्पश्चात दोनों हाथ जोड़कर निम्नानुसार ध्यान करें -----

ॐ आनन्दमानन्द करं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधरूपं।
  योगीन्द्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद्गुरुं नित्यमहं नमामि।।

          इस प्रकार ध्यान के पश्चात श्रीनिखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच के १०८ पाठ सम्पन्न करें -----

मूल कवचम्

ॐ शिरो मे पातु निखिलः सर्व सम्पत् यशस्करः।
     नेत्रे पातु निरालम्बः नर चित्त प्रमोदकः।।१।।
     श्रुतौ रक्षेत् सुसंवैद्यः दुःख-ताप निवारकः।
     नासिके च द्वयं पातु नित्यं पातु निरंजनः।।२।।
     गण्डौ पातु गणाध्यक्षः गणेशः गणनायकः।
     मस्तकं परमोदारः पातु च परिनिष्ठितः।।३।।
     जिह्वां रक्षेत् जगज्येष्ठः जगन्मंगलदायकः।
     वाचं मे पातु विश्रब्धः वेद वैद्य विशारदः।।४।।
     कण्ठदेशं कलानाथः नित्य कल्पः नियामकः।
     बाहु मूलं सदा पातु ब्रह्माण्डस्य च नायकः।।५।।
     कुमुदमाली करौ पातु काव्यशास्त्र कलात्मकः।
     हृदयं हरि प्रियः पातु अंशौ च अखिलाधरः।।६।।
     नाभिं "निं" सदा रक्षेत् सर्वांगं सर्वसन्धिषु।
     गृहे अरण्ये सदा पायात् दुष्ट दैव विघातकः।।७।।
     मुखं पातु महोपायः महोल्लासः महातपः।
     कमनीयः कटिं रक्षेत् कनकांगः कलाधरः।।८।।
     वाचं मुखं पदं रक्षेत् विश्वकर्मा विशोधनः।
     लिंगं लोकोत्तरः पातु लोहांगः लोक विश्रुतः।।९।।
     मूष्क द्वयं महामायः रक्षेच्च मनमोहनः।
     जंघायुग्मं सदा पातु महातेजः महातपः।।१०।।
     पृष्ठं पातु च पूतात्मा पुण्यतीर्थ निषेवितः।
     जिह्वां च जपोपेतः गुल्फौ च गण सेवितः।।११।।
     पादोर्ध्वे सदा पातु पुत्र-पौत्र विवर्धनः।
     रक्त विन्दून् प्ररक्षेच्च राजीवायतलोचनः।।१२।।
     मनो मे पातु "खिं" बीजं सर्व दिक् च दिशां पतिः।
     "लं" बीजं सदा पातु बुद्धीन्द्रियं वचांसि मे।।१३।।

फलश्रुति

     राजकार्ये विवादे च पंच वारं पठेत् तु यः।
     सर्वत्र विजय भूतिः नात्र संशय संशयः।।१।।
     सर्वकार्ये सभामध्ये अष्ट वारं पठेत् तु यः।
     सर्वसिद्धिः भवेत् शीघ्रं आपदुद्धारकं हि तत्।।२।।
     इदं तु कवचं पुण्यं यः पठेत् गुरु सन्निधौ।
     तस्य सर्वत्र रक्षा स्यात् नात्र काचित् विचारणा।।३।।

          पहले पाठ में मूल कवच और फलश्रुति दोनों का पाठ करें। बीच के पाठों में मात्र मूल कवच का पाठ करें और अन्तिम पाठ में पुनः मूल कवच एवं फलश्रुति दोनों का पाठ करें।

          एक सौ आठ पाठ पूरे होने के पश्चात एक आचमनी जल छोड़कर सम्पूर्ण जाप (पाठ) पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी को ही समर्पित कर दें। इस प्रकार नित्य ११ दिन तक यह साधना सम्पन्न करें।
    
          जब आप किसी भी साधना को करते हैं तो यह आवश्यक है कि आप मूल साधना को कम-से-कम ४-५ बार करें और उसके बाद उसकी निरन्तरता बनाए रखने के लिए नित्य कवच या मन्त्र का कुछ मात्रा में पाठ या जाप करें। विशेषतया कवच या स्तोत्र आदि की सिद्धि १००० पाठ से हो जाती है और इस तरह ४-५ बार में कुल चार या पाँच हजार पाठ सम्पन्न हो जाते हैं। कुछ कवचों और स्तोत्रों में उनकी पाठ संख्या दी गई होती है। इन सबके बाद ही आप कवच या स्तोत्र में लिखे प्रयोग आदि को करने की पात्रता अर्जित करते हैं।

           आपकी साधना सफल हो और आपको पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो। मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए ऐसी ही कामना करता हूँ।

               इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिलजी को आदेश आदेश आदेश।।।

बुधवार, 1 नवंबर 2017

श्री निखिलेश्वरानन्द साबर सिद्धि साधना

श्री निखिलेश्वरानन्द साबर सिद्धि साधना
         
           निखिल संन्यास दिवस निकट ही है। यह इस बार ४ नवम्बर २०१७ को आ रहा है। आप सभी को निखिल संन्यास दिवस की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          एक अकेला व्यक्तित्व जो संसार की समस्त साधनाओं और सिद्धियों को समेटे हुए है, जो अपने आप में अप्रतिम, अद्भुत और अनिवर्चनीय है, जिनमें हिमालय की ऊँचाई और सागरवत् गहराई भी है। उच्चकोटि की वैदिक एवं दैविक साधनाओं में जहाँ यह व्यक्तित्व अग्रणी है, वहीं औघड़, श्मशान और साबर साधनाओं में भी अन्यतम है।

          परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्दजी का व्यक्तित्व ऐसा ही अनिन्द्य, अनिवर्चनीय और अद्वितीय है। औघड़ साधनाओं, साबर साधनाओं तथा समस्त साधनाओं के विषय में आज पूरे विश्व में उच्चतम प्रामाणिक व्यक्तित्व माने जाते हैं। साधनाओं के तो वे महारथी हैं।

          संसार की शायद ही ऐसी कोई साधना पद्धति रही होगी, जिनको उन्होंने आत्मसात् न किया हो। साबर साधनाओं के तो वे मसीहा हैं। उन्होंने गुरु गोरखनाथ के स्तर पर खड़े होकर उनके चिन्तन को समझा है तथा उनकी साधना-सम्बन्धी न्यूनताओं को सुधार है, उनको परिमार्जित किया है। उन साधना विधियों को खोज निकाला है, जो अभी तक अपने आप में अगम्य रही है।

          साबर साधनाएँ जीवन की सरल, सहज और महत्वपूर्ण साधनाएँ हैं, जिनमें लम्बे-लम्बे संस्कृत के श्लोक नहीं है, अपितु सरल भाषा में सफलता की शैलियाँ हैं। इस क्षेत्र में भी उन्होंने उन विद्याओं को ढूँढ निकाला है, जो अपने आप में लुप्त हो गई थी, जिनके प्रयास से आज भी ये विद्याएँ जीवित है।

          पूज्यपाद सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्दजी का व्यक्तित्व अपने आप में पूर्णता लिए हुए है। उन्हें इन विद्याओं की पूर्ण प्रामाणिकता के साथ जानकारी है। आज पूरे विश्व में सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्दजी ही है, जिन्हें लुप्त विद्याओं की प्रामाणिक जानकारी है, वे लुप्त विद्याएँ हैं - परकाया प्रवेश विद्या, हाजी विद्या, काजी विद्या, मदालसा विद्या, वायुगमन सिद्धिकनकधारा सिद्धि, सूर्य विज्ञान, संजीवनी विद्या आदि।

          भारतीय साधना क्षेत्र का मध्यकाल अन्धकार में था। ऐसे अन्धकार के क्षणों में सूर्य की तरह पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का अवतरण हुआ, जिन्होंने खोई हुई साधना-सम्पदा को पुनः भारतीयों को देने का अथक प्रयास किया। उस लुप्त साहित्य से लोगों को परिचित किया और मन्त्र एवं साधना के क्षेत्र में लोगों की आस्था बनी। एक बार पुनः साधना-सम्बन्धी चेतना लोगों में जागृत हुई, पुनः प्रकाश की किरणें इस धरती पर प्रकट हुई। उन साधनाओं को सीखने और समझने की ललक जगी तथा वे साधना पथ की ओर अग्रसर हुए।

साधना विधि :-----------

          साधक को चाहिए कि वह निखिल जयन्ती, निखिल संन्यास दिवस, गुरु पूर्णिमा अथवा किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के गुरुवार को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पीली धोती पहन लें, पीली गुरु चादर लें। सफ़ेद आसन पर पूर्व की ओर मुँह करके सुखासन या पद्मासन में बैठ जाएं।

          अपने सामने किसी चौकी (बाजोट) पर पीला वस्त्र बिछा लें, उसके ऊपर प्राण-प्रतिष्ठित गुरु चित्र तथा गुरु यन्त्र स्थापित करें। लोबान धूप तथा घी का दीपक जलाकर रख लें।

          सर्वप्रथम भगवान गणपतिजी का स्मरण करके एक माला किसी भी गणपति मन्त्र का जाप करें। फिर भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें। 

          फिर दोनों हाथ जोड़कर पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का निम्नानुसार ध्यान करें -----

ॐ गुरुर्वै शतां द्वै हिमलेव ध्यानम् प्रज्ञा प्रदम्शे निवेदं च ध्याना।
दैवत्व दर्शन मदैव भवसिन्धु पारं गुरुर्वै कृपात्वं गुरुर्वै कृपात्वं।।

          उसके बाद निम्न मन्त्रों से गुरु चरणों में जल चढ़ावें ----

ॐ भवाय नमः पादो पूजयामि नमः।
ॐ गुरुभ्यो नमः पादो पूजयामि नमः।
ॐ परम गुरुभ्यो नमः पादो पूजयामि नमः।
ॐ परात्पर गुरुभ्यो नमः पादो पूजयामि नमः।
ॐ पारमेष्ठि गुरुभ्यो नमः पादो पूजयामि नमः।
ॐ रुद्राय नमः पादो पूजयामि नमः।
ॐ रिलाय नमः पादो पूजयामि नमः।
ॐ भवाय नमः पादो पूजयामि नमः।
ॐ सर्वाज्ञान हराय नमः पादो पूजयामि नमः।

          फिर यन्त्र और चित्र का गन्ध (कुमकुम या अष्टगन्ध) एवं अक्षत से पूजन कर धूप, दीप तथा नैवेद्य अर्पित करें ---

गन्धम् समर्पयामि श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः।
अक्षतान् समर्पयामि श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः।
धूपम् आघ्रापयामि श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः।
दीपम् दर्शयामि श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः।
नैवेद्यम् निवेदयामि श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः।

          इसके बाद दोनों हाथों में पुष्प लेकर पुष्पांजलि समर्पित करें ---

ॐ परमहंसाय विदमहे महातत्पराय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात्।
ॐ महादेवाय विदमहे रुद्रमूर्तये धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।
ॐ गुरुदेवाय विदमहे परब्रह्माय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात्।
श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः पुष्पांजलिं समर्पयामि।

          फिर पुनः एक बार हाथ जोड़े और पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी को नमस्कार करें -----

ॐ नमोष्टुग्रवे तस्मै इष्टदेव स्वरूपिणे।
सस्य वाग्मृतं हन्ते विषं संसार संज्ञकाम्।।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवै नमः।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम् देव देव।।

          सामने चौकी पर जिसमें पीला वस्त्र बिछा हो, उस पर लाल रंग से रँगे हुए चावल से अष्टदल कमल बनाकर ताँबे की प्लेट रखें। उस प्लेट में कुमकुम से स्वस्तिक का निर्माण करें। स्वस्तिक की चारों दिशाओं की चार लाइनों पर चार सुपारी स्थापित करें। यह चार सुपारियाँ चार गुरुत्व शक्ति का प्रतीक हैं। फिर उन चारों का कुमकुम लगाकर पूजन करें, अक्षत और पुष्प भी चढ़ावें। फिर बाँयें हाथ में सरसों के दाने एवं काली मिर्च के दाने मिलाकर चारों सुपारी पर क्रमशः चढ़ावें और निम्न सन्दर्भ का उच्चारण करें -----

ॐ गुरुभ्यो स्वाहा।          (एक सुपारी पर चढ़ावें)
ॐ परम गुरुभ्यो स्वाहा।          (दूसरी सुपारी पर चढ़ावें)
ॐ परात्पर गुरुभ्यो स्वाहा।          (तीसरी सुपारी पर चढ़ावें)
ॐ पारमेष्ठि गुरुभ्यो स्वाहा।          (चौथी सुपारी पर चढ़ावें)

          इसके बाद स्वस्तिक के मध्य में तेल का दीपक जलावें। फिर "रुद्राक्ष माला" से निम्न मन्त्र का ११ माला जाप सम्पन्न करें -----

मूल मन्त्र :-----------

।। ॐ न्रिं निखिलेश्वराय न्रिं हुं जं जं सिद्धये फट् ।।

OM NRIM NIKHILESHWARAAY NRIM HUM JAM JAM SIDDHAYE PHAT.

          मन्त्र जाप समाप्ति के पश्चात पुनः संक्षिप्त गुरुपूजन सम्पन्न करें। फिर समस्त जाप एक आचमनी जल छोड़कर पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी को ही समर्पित कर दें।

          इस प्रकार इस साधना क्रम को नित्य ग्यारह दिनों तक सम्पन्न करना चाहिए।

          साधना समाप्ति के बाद अगले दिन प्रातः माला को गले में पहिन लें। शेष सामग्री को उसी कपड़े में बाँधकर ग्यारह दिनों तक के लिए अपने पूजा स्थान में ही रख दें। बाद में  सभी सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें। माला एक वर्ष तक पहिने रहें।

          इस साधना के माध्यम से आपके जीवन में धन-धान्य, यश, मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति, साधनाओं में सफलता तथा पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी के पूर्ण आशीर्वाद की प्राप्ति होगी। इस साधना से परमपूज्य सद्गुरुदेव श्री निखिलेश्वरानन्दजी की दिव्यता और चैतन्यता को आप स्वयं ही अनुभूत कर सकेंगे। यह आपका सौभाग्य होगा।

          आपकी साधना सफल हो और आपको पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो। मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए ऐसी ही कामना करता हूँ।

          इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश।।।