मंगलवार, 12 जुलाई 2022

शिवलोक रहस्य साधना

 शिवलोक रहस्य साधना

          भगवान शिव प्रिय मास श्रावण मास निकट ही है। इसे शिव मास भी कहा जाता है। यह १४ जुलाई २०२२ से आरम्भ हो रहा है। आप सभी को शिव मास श्रावण मास की अग्रिम रूप से बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ!

          हमारे पुराणों में कई प्रकार के लोक-लोकान्तरों का उल्लेख मिलता है‚ जैसे देवलोक‚ यक्षलोक‚ गन्धर्वलोक‚ ब्रह्मलोक‚ शिवलोक‚ इन्द्रलोक आदि। वस्तुतः मुझे लगता था‚ कि हमारे पुराणों में जो भी लिखा है‚ वह सत्य है‚ लेकिन संकेतात्मक रूप में विविध उल्लेख अवश्य मिलता है। कहानियों के पीछे कई प्रकार के मत या विचारधारा तथा लक्ष्य हो सकते हैं‚ जिन्हें मात्र उस विषय में गहरी शोध के बाद समझा जा सकता है। जैसे कि मार्कण्डेय पुराण में स्थित दुर्गाशप्तशती पूर्ण तान्त्रोक्त विधानों का संग्रह है। सामान्य व्यक्ति को वह सिर्फ एक कहानी ही प्रतीत हो सकती है और लोक-लोकान्तरों के विषय में भी लोगों की यही धारणा बनी‚ कि वह मात्र कहानियाँ ही है। लेकिन ऐसा नहीं है‚ हमारे तन्त्र ग्रन्थों में बराबर कई ऐसी साधनाओं के विधान दिए हैं‚ जिसके माध्यम से कुछ दिनों में व्यक्ति सूक्ष्म रूप से लोक-लोकान्तरों की यात्रा कर सकता है।

          जीवन का यह दिव्य सौभाग्य ही है‚ कि हम उन लोक में जाएं‚ वहाँ के निवासियों को देखें‚ उनके साथ वार्तालाप करें‚ वहाँ की दिव्यता का आनन्द उठाएं‚ वहाँ के सौन्दर्य को आत्मसात करें। देवताओं के जिन लोकों का उल्लेख हैं‚ वहाँ वे देवता सशरीर निवास करते हैं‚ उनके दर्शन कर‚ आशीष पाकर जीवन को दिव्य बनाएं। कुछ ऐसा ही चिन्तन लेकर मैं भी जुट गया इस दिशा में और साधना के अन्तिम दिन जो भी अनुभूतियाँ हुई‚ उन दिव्य अनुभूतियों को कोई भी लेखनी लिख नहीं सकती। सामान्य व्यक्तियों के लिए यह भी एक कहानी ही हो सकती है। 

          लेकिन जिन्होंने अपने सद्गुरुदेवजी के साथ समय बिताया है तथा उनके चरण कमलों में साधना ज्ञान को प्राप्त किया है‚ वह भलीभाँति समझ सकता है‚ कि साधना के माध्यम से कुछ भी असम्भव नहीं है। शिवलोक भी ऐसा ही एक लोक है‚ जिसका विवरण कई पुराणों में बार-बार प्राप्त होता है। यहाँ तक कि इस लोक में भगवान सदाशिव का स्थायी निवास भी बताया गया है। इसकी भौतिक स्थिति पर कई प्रकार के वाद-विवाद हो सकते हैं। किसी कल्पना की तरह ही यह लोक अत्यधिक दिव्यता युक्त है। बर्फीले वातावरण में प्रकृति अपने पूर्ण श्रृंगार के साथ इस लोक में स्थायी रहती है। साथ ही साथ कई श्रेष्ठ योगी‚ जिन्होंने अपने साधना बल से इसमें प्रवेश किया है‚ वे इधर-उधर विचरण करते हुए नज़र आते हैं‚ तो किसी तरफ शिव के सहायक गणों की भी आवाजाही रहती है। 

          जिसमें वीरभद्र तथा भैरव भी शामिल होते हैं। आगे के स्थान में जहाँ पर अपने आप ही “ॐ” नाद का गुँजरण होता रहता है‚ वहाँ पर एक अत्यधिक मनोहर स्थान पर उच्च वेदी पर भगवान सदाशिव अपने पूर्ण रूप में हमेशा विद्यमान रहते हैं। सामने कई योगी‚ महायोगी तथा अन्य सेवकगण एवं लोक-लोकान्तर से आए शिवभक्त शिव अर्चना में भाव विभोर होकर मग्न ही रहते हैं।

          क्या होगा इससे बड़ा सौभाग्य कि देवताओं की प्रत्यक्ष पूजा की जाए। योगीजन समाधि मग्न होते हैं। सौभाग्यशाली भी होते हैं कुछ एक‚ जिन्हें भगवान सदाशिव अपने श्रीमुख से खुद ही आशीर्वाद देते हैं। कल्पना से भी परे अगर कोई मधुर अनुभव होगा तो वह यही होगा। इस शिवलोक में प्रवेश साधना के माध्यम से मिल सकता है। इस अत्यधिक दुर्लभ विधान को प्राप्त करने के लिए क्या-क्या करना पड़ा था? यह तो पूरी एक अलग कहानी है‚ लेकिन मेरे सभी भाईयों/बहिनों के मध्य मैं इस विधान को भी रखना चाहूँगा‚ ताकि सब अपना जीवन दिव्यता की ओर अग्रसर कर सके तथा देख सके‚ कि साधना में आज भी कितनी शक्ति है? 

साधना विधान :------------ 

          इस साधना को श्रावण मास में सोमवार के दिन रात्रिकाल में १० बजे के बाद शुरू करना चाहिए। साधक को अपने सामने विशुद्ध प्राण-प्रतिष्ठित पारदेश्वर की स्थापना करनी चाहिए तथा उसका पूर्ण पूजन करें‚ धतूरे के फूल अर्पित करें। साधक का मुख उत्तर की तरफ होना चाहिए तथा कमरे में दूसरा कोई व्यक्ति न हो। 

          पूजन के बाद साधक मन्त्र का पूर्ण श्रद्धा के साथ जाप करें। इसके लिए रुद्राक्ष माला पर मन्त्र जाप हो। साधक के वस्त्र काले या फिर सफ़ेद रंग के हो। वस्त्रों के रंग का ही आसन हो। साधक को पहले एक माला लघु अघोर मन्त्र की करनी चाहिए। 

लघु अघोर मन्त्र :------------ 

॥ ॐ अघोरेभ्यो घोरेभ्यो नमः ॥

OM AGHOREBHYO GHOREBHYO NAMAH.

          इसके बाद साधक दिव्य शिवलोक मन्त्र की ५१ (इकावन) माला मन्त्र जाप करें -----

दिव्य शिवलोक मन्त्र :------------ 

॥ ॐ शिवे त्वं लोक प्रसीद अघोरेश्वर्ये दिव्य दर्शय आत्मदृष्टि जाग्रयामि फट् ॥

OM SHIVE TWAM LOK PRASEED AGHORESHWARYE DIVYA DARSHAY AATMADRISHTI JAAGRAYAAMI PHAT. 

          मन्त्र जाप समाप्ति पर शिव को ही मन्त्र जाप समर्पित कर दें। इसके बाद साधक वहीं पर सो जाए। यह क्रम साधक अगले १४ दिनों तक (कुल १५ दिन) चालू रखें। 

          अन्तिम रात्रि को सोने के बाद अपने सूक्ष्म शरीर से शिवलोक में निश्चित रूप से प्रवेश करता है तथा भगवान सदाशिव के दर्शन को कर लेता है। माला को प्रवाहित न करें‚ उसे पूजा स्थान में स्थापित कर दें। 

               आपकी साधना सफल हो और आपकी मनोकामना पूर्ण हो! मैं पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी से आप सबके लिए ऐसी  ही कामना करता हूँ। 

               इसी कामना के साथ

        ॐ नमो आदेश निखिलजी को आदेश आदेश आदेश।।।

शनिवार, 2 जुलाई 2022

गुरु आत्म-स्थापन साधना

 गुरु आत्म-स्थापन साधना

      

           उच्चकोटि के साधकों एवं शिष्यों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व गुरुपूर्णिमा समीप ही है। इस बार गुरुपूर्णिमा १३ जुलाई २०२२ को आ रही है। आप सभी को गुरुपूर्णिमा पर्व की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ।

          शिष्य जब समर्पण भाव में आ जाता है और वह गुरु के साथ एकाकार होने के लिए मन-मस्तिष्क एवं हृदय से दृढ़ हो जाता है, तो गुरु शिष्य के साथ आत्मलीन होकर उसे अपना सम्पूर्ण प्यार उड़ेल देते हैं।

          परम पूज्य सद्गुरुदेव डॉ. नारायणदत्त श्रीमालीजी, जो हम सबके सद्गुरुदेव हैं एवं हमारे प्राणप्रिय हैं। उन्होंने अपनी क्रिया द्वारा यह भौतिक देह भले ही छोड़ दी हो, वे सिद्धाश्रम में पूज्य श्रीनिखिलेश्वरानन्द स्वरूप में विराजमान हैं और आत्मिक रूप से हम सबके मध्य ही तो स्थित हैं।

          मात्र शिष्यों के कल्याण के लिए ही वे आए और उनकी नज़र में प्रत्येक शिष्य समान ही रहा, चाहे वह एक वर्ष से जुड़ा हो या दस वर्ष से या दस दिन से या अभी भी जुड़ने का मानस बना रहा हो, तभी तो करुणा से वशीभूत होकर वे यह साधना दे गए, जिसको सम्पन्न कर आप हर समय गुरु की सान्निध्यता अनुभव कर सकते हैं।

          एकलव्य गुरु द्रोण के आश्रम से काफी दूर जंगलों में रहता था। उसने वहाँ गुरु की मूर्ति स्थापित कर अभ्यास जारी रखा। गुरु द्रोण सदैव उस मूर्ति में प्राण स्वरूप में विराजमान रहते थे और एकलव्य को प्रेरणा दिया करते थे। यह रहस्य केवल एकलव्य और गुरु द्रोण ही जानते थे। सशरीर रूप में कभी सामने न आकर भी एकलव्य को मात्र धनुर्विद्या में ही नहीं, अपितु अपना सर्वस्व ज्ञान देकर पूर्ण कर दिया।

          प्रस्तुत “गुरु आत्म-स्थापन साधना” पूज्य द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य को दी गई साधना का परिवर्द्धित रूप है, जिससे साधक गुरु-कृपा प्राप्ति के लिए तीव्रता से अग्रसर हो सके और उन्हें गुरुदेव के सानिध्य का अहसास होना प्रारम्भ हो जाए। एकलव्य ने भी साधना के द्वारा ही गुरु द्रोण की सूक्ष्म उपस्थिति को साकार किया था। आवश्यकता है तो मात्र इस साधना को पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास से सम्पन्न करने की।

          अभी तक यह साधना गोपनीय ही रही है, परन्तु अब वर्तमान समय को देखते हुए, शिष्यों की तड़प और बेचैनी का अनुभव करते हुए, उनकी वेदना को समझते हुए ही इस साधना को उजागर किया जा रहा है। 

साधना विधान :------------

          इस साधना को गुरु पूर्णिमा अथवा शुक्लपक्ष के किसी भी गुरुवार अथवा किसी भी मास की २१ तारीख अथवा किसी भी मास के “गुरु श्रद्धाञ्जलि समर्पण दिवस” (शुक्लपक्ष की नवमी) से प्रारम्भ किया जा सकता है। स्नान आदि से निवृत्त होकर उत्तराभिमुख होकर पूजा स्थल में एक श्वेत वस्त्र बिछाकर सद्गुरुदेवजी का एक चैतन्य चित्र स्थापित करें। चित्र ऐसा हो, जिसे आप स्नान करा सकें, विधिवत पूजन कर सकें, तिलक लगा सकें। ऐसा भव्य चित्र हर समय आपके पूजा स्थान में स्थापित रहे। इस चित्र के साथ ही सिद्धाश्रम चेतनायुक्त “गुरु आत्म यन्त्र” भी स्थापित करें।

          उसके बाद सद्गुरुदेवजी के ललाट, कान, कण्ठ, हृदय स्थान, नाभि, दोनों भुजाओं पर चन्दन से तिलक करें। यह तिलक बिन्दी स्वरूप हो, तत्पश्चात गुरु चित्र पर सुगन्धित माल्य अर्पण करें। तदनन्तर निम्न मन्त्र का १०५ बार उच्चारण करते हुए गुरु चित्र और यन्त्र पर अक्षत चढ़ाते हुए गुरुदेव का आवाहन करें -------

आवाहयामि आत्म स्वरूपम्, आवाहयामि प्राण स्वरूपम्।

आवाहयामि मम देह चिन्त्यं, गुरुत्वं शरण्यं गुरुत्वं शरण्यम्॥

          अब आप अपने सामने एक कटोरी में चन्दन लेकर उसे अपने शरीर के अंगों (ललाट, कान, कण्ठ, हृदय स्थान, नाभि, दोनों भुजाओं) पर लगाएं और निम्न मन्त्र का उच्चारण करें। इन मन्त्रों के उच्चारण के साथ ही गुरुदेव को अपने हृदय स्थान पर विराजमान होने का भाव रखें -------- 

ॐ कूर्माय नमः। ॐ आधार शक्तयै नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ धर्माय नमः। ॐ ज्ञानाय नमः। ॐ सवित्रालाय नमः। ॐ ऐश्वर्याय नमः। ॐ विकारमयकेशरेभ्यो नमः। ॐ पञ्चाशर्णाबीजाद्याकर्णिकायै नमः। ॐ वैराग्याय नमः। अनैश्वर्याय नमः। ॐ अनन्ताय नमः। ॐ सर्वतत्वात्मकाय नमः। ॐ आनन्दकन्द कन्दाय नमः। ॐ प्रकृतिमयपत्रेभ्यो नमः।

          चूँकि आप दीक्षित शिष्य हैं और नित्य गुरुमन्त्र का जाप करते हैं। अतः मन्त्र जाप से पूर्व जिस माला से गुरुमन्त्र जाप करते हैं, उस माला से गुरुमन्त्र की ४ माला जाप करें। इसके बाद “गुरु सिद्धि माला” से २१ माला “गुरु आत्मस्थापन मन्त्र” का जाप करें -------

गुरु आत्मस्थापन मन्त्र :------------

॥ ॐ ह्रीं क्लीं गुरुत्व आत्म ऐक्यं ह्रीं फट् ॥

OM HREEM KLEEM GURUTVA AATMA AIKYAM HREEM PHAT. 

          यह २१ दिन की साधना है और इसे प्रातःकाल अथवा रात्रि में ही सम्पन्न करना चाहिए। मन्त्र जाप के बाद साधक को दस मिनट शवासन में लेट जाना चाहिए। ऐसा करने से मनोरम प्राकृतिक दृश्य दिखाई दे सकते हैं। इस साधना से अनेक प्रकार के अनुभव होते हैं।

          २१ दिन के बाद माला को जल में प्रवाहित कर दें और यन्त्र को पूजा स्थान में स्थापित कर दें। बाद में भी इस मन्त्र का नित्य १५-२० मिनट तक जाप करने के पश्चात शवासन करें। धीरे-धीरे साधक को गुरुदेव की उपस्थिति का अनुभव होने लगेगा, आपके मन में उमड़ रहे प्रश्नों का उत्तर भी मिलने लगेगा, जीवन में साहस और निडरता आ जाएगी।

          आपकी यह साधना सफल हो! मैं पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी से आप सबके लिए ऐसी कामना करता हूँ।

               इसी कामना के साथ

        ॐ नमो आदेश निखिलजी को आदेश आदेश आदेश।।।

 

बुधवार, 29 जून 2022

आतमघट बसो मेरे गुरुवर!

आतमघट बसो मेरे गुरुवर!

 

          पूज्यपाद सद्गुरुदेव निखिलेश्वरान्दजी कुछ शिष्यों के साथ उपस्थित थे। उस दिन वे गुरु और शिष्य के सम्बन्धों की उन गहराइयों को उजागर कर रहे थे, जो केवल सद्गुरु ही अपने प्रिय शिष्यों में उतार सकते हैं। पूज्य गुरुदेवजी उस दिन द्रोणाचार्य और एकलव्य के सन्दर्भ में प्रवचन कर रहे थे।
 
          द्रोणाचार्य के जीवन की यह विडम्बना रही है, कि जितना चुनौतीपूर्ण जीवन उन्होंने जिया, उतना शायद ही किसी अन्य ऋषि ने जिया हो, उन्हें बहुत लाञ्छन सहने पड़े और वह सब मात्र केवल अपने शिष्य के लिए, केवल अपने शिष्य को पूर्णता देने के लिए, इतिहास पुरुष बनाने के लिए।
 
          जब एकलव्य उनके पास पहुँचा, तो द्रोणाचार्य ने तुरन्त अपने ज्ञान चक्षुओं से जान लिया, कि यह मेधावी व्यक्तित्व है और शिष्य की पात्रता से युक्त है। क्योंकि गुरु के पास तो आत्मभेदी दृष्टि होती है, वे एक क्षण में ही सब कुछ समझ लेते हैं — आने वाली घटनाओं को, घटना चक्र को और आने वाले समय को। द्रोणाचार्य की पारखी नजर ने अवलोकन कर लिया था भविष्य का। जिस तरह एक शिष्य की साध होती है, कि  उसे योग्य गुरु प्राप्त हो, ठीक उसी तरह एक गुरु को भी योग्य पात्र की आवश्यकता होती है, कि योग्य पात्र मिले और जो गुरु की कसौटी पर पूर्ण खरा उतरे, वह अपना ज्ञान उसमें उड़ेल सके, अपने ज्ञान से उसके हृदय को आलोकित कर सके।
 
          परन्तु द्रोणाचार्य के सामने एक विवशता थी, कि वे राजदरबार का अन्न खाते थे। वैसे तो राज्य के प्रत्येक कार्य में वे भागीदार थे, उनकी मन्त्रणा पर ही कार्य सम्पन्न होते थे, लेकिन फिर भी राजाज्ञा के बिना राजघराने के अतिरिक्त किसी अन्य छात्र को विद्याध्ययन के लिए आश्रम में रखना राजघराने की परम्परा के अनुकूल नहीं था, क्योंकि राजघराने की अपनी मान्यता हुआ करती थी।
 
          गुरु द्रोणाचार्य चाहकर भी उस बालक को शिष्य के रूप में सर्वमान्य तरीके से दीक्षा देकर शिष्य घोषित नहीं कर सकते थे। यह कितनी बड़ी विडम्बना थी उस योग्य गुरु के सामने, कितनी टीस हुई होगी उनके हृदय में।
 
          उन्होंने देखा, कि स्थूल देह से वे उसे ज्ञान नहीं सकते, तो दूसरा पहलू कार्यान्वित किया सूक्ष्म देह से भावनात्मक रूप में पूर्णत्व ज्ञान देने का।
 
          एकलव्य द्रोणाचार्य के समक्ष उपस्थित होता है और निवेदन करता है, कि मुझे भी दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लें और धनुर्विद्या रूपी ज्ञान प्रदान करें। ब्रह्माण्ड में आपसे बढ़कर इस श्रेष्ठ विद्या का कोई ज्ञाता नहीं है।
 
          मर्यादित गुरु अपनी मर्यादा में मौन रह गए और आशीर्वाद दिया कि “कल्याण हो।” केवल मात्र इन्हीं शब्दों से एकलव्य को ज्ञान का प्रकाश मिला तथा उसका निश्चय और अधिक दृढ़ हो गया। उसने अपने स्थान, अपनी झोपड़ी में जाकर गुरु का ध्यान किया तो आत्म आदेश प्राप्त हुआ, कि तू मेरी एक मिट्टी की मूर्ति बना ले और एकलव्य की भावना इतनी अधिक प्रबल और विश्वासयुक्त थी, कि उसने मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजनकर गुरु का आवाहन कर उनसे आत्मिक अनुमति लेकर विद्याभ्यास प्रारम्भ कर दिया। यह केवल एक पक्षीय क्रिया नहीं थी, इसमें गुरु और शिष्य दोनों थे, हृदय के सूक्ष्म तार जुड़े रहे। इस पूरी प्रक्रिया में एकलव्य बराबर यही अनुभव करता रहा, कि गुरुदेव किस प्रकार उसके साथ प्रतिक्षण रहते हुए उसकी प्रत्येक त्रुटियों को दूर कर देते हैं।
 
          इस सम्पूर्ण क्रिया में द्रोणाचार्य कहीं पर भी अपनी मर्यादा से पदच्युत नहीं हुए, क्योंकि अन्न तो स्थूल देह ग्रहण करती है। अतः यह सामाजिक बन्धन से बँधी है, परन्तु सूक्ष्म देह पर कोई बन्धन नहीं होता, वहाँ वह स्वतन्त्र होती है और द्रोणाचार्य सूक्ष्म रूप से एकलव्य के पास सदैव रहते थे।
 
          समय व्यतीत होता रहा और अर्जुन तथा एकलव्य दोनों ही अपनी-अपनी विधि से गुरु द्रोण द्वारा शस्त्र संचालन की क्रिया का ज्ञान प्राप्त करते रहे। आगे प्रसंग है, कि अर्जुन को यह अभिमान हो गया कि मेरे पास द्रोणाचार्य जैसे महान गुरु द्वारा सिखाई गई विद्या है और मेरे बराबर भूमण्डल में कोई भी धनुर्धारी नहीं है और जैसे ही गुरु को यह आभास हुआ, तो उन्होंने विचार किया कि अब समय आ गया है, कि अपने शिष्य अर्जुन का अभिमान खण्डित कर ही दूँ। क्योंकि गुरु को आवश्यकता होती है विनम्र शिष्य की, जो पारंगत होते हुए भी विनम्र भाव से शिष्यवत् ही रहे।
 
          और इसी उद्देश्य से गुरु द्रोण अपने अन्य शिष्यों और अर्जुन के साथ वन भ्रमण के लिए गए।
 
          उनके साथ ही आश्रम का श्वान भी चल रहा था। वह श्वान थोड़ी देर बाद भौंकता हुआ आगे चला गया, किन्तु थोड़ी देर बाद ही उसके भौंकने की आवाज़ बन्द हो गई। आगे जाने पर कुत्ता वापिस आते दिखा, तो उन्होंने देखा कि उसका मुँह तीरों से भरा हुआ है। अर्जुन ने तीरों को बाहर निकाला, तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ, कि कुत्ते को ज़रा भी खरोंच नहीं आई है। अर्जुन को घोर आश्चर्य होता है, वह अति विस्मय से पूछता है, कि “गुरुदेव! आपने तो कहा था, मैं ही श्रेष्ठतम धनुर्धर हूँ। यह कौन है जो मुझसे बढ़कर इस विद्या का ज्ञाता है।” गुरु मन्द हास्य से कहते हैं, कि “चलो, आगे चलकर देखते हैं।”
 
          आगे जाने पर द्रोण, अर्जुन एवं अन्य शिष्य देखते हैं, कि एक आदिवासी युवक हाथों में धनुष-बाण लिए अभ्यास कर रहा है। गुरु द्रोण को देखते ही एकलव्य ने साष्टांग दण्डवत प्रणाम  किया और विनम्रता से कहा, कि आज मेरा जीवन धन्य हो गया।
 
          गुरु द्रोण कहते हैं – “मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ, परन्तु यह जानना चाहता हूँ, कि तुम्हें किस गुरु ने यह विद्या सिखाई है?”
 
          एकलव्य कहता है – “मेरी कुटिया में मेरे गुरु आसीन है।”
 
          इतना कहकर वह द्रोणाचार्य को कुटिया के अन्दर ले गया, जहाँ पर उसका साधना कक्ष था, सुन्दर सुसज्जित गुरु की मिट्टी से बनी मूर्ति स्थापित थी, गले में ताजे पुष्पों की माला सुगन्ध बिखेर रही थी। एकलव्य ने कुटिया के अन्दर गुरु द्रोण के चरणों को प्रक्षालित किया और गुरु ने भी उसे तत्क्षण पूर्णता का आशीर्वाद दिया। अमरत्व का वरदान दे दिया।
 
          इतिहास का सबसे मार्मिक क्षण उपस्थित था, द्रोण जैसे गुरु अपने शिष्य को इतिहास पुरुष बनाने के लिए अपने ऊपर लाञ्छन लेने को सन्नद्ध थे। द्रोणाचार्य अच्छी तरह समझते थे, कि आने वाली पीढ़ियाँ मुझे धिक्कारेंगी, मुझ पर आरोप लगाएंगी, परन्तु इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था, जिससे एकलव्य का नाम इतिहास में अमर किया जाए। अर्जुन का इतिहास तो उनके सामने स्पष्ट था, कि राजघराने का है और उसे ऐसे कई क्षण मिलेंगे, जिससे वह अमर हो जाएगा, लेकिन इसे यदि इस हाल में छोड़ दिया, तो इसकी सभी विद्याएँ मात्र आखेट करने में ही समाप्त हो जाएंगी और आने वाला इतिहास मेरे इस शिष्य को भूल जाएगा।
 
          कितना दर्द, कितनी पीड़ा रही होगी उस गुरु के मन में, जिसने अपने शिष्य से उसके दाहिने हाथ का अँगूठा गुरु दक्षिणा के रूप में माँग लिया। वह मात्र दाहिने हाथ का अँगूठा ही नहीं था, उस एकलव्य के जीवन की जमा पूँजी, सारी धरोहर, सारी तपस्या थी, क्योंकि धनुर्धर के लिए उसके दाहिने हाथ का अँगूठा ही तो सबसे महत्वपूर्ण अंग है और सद्गुरु जब शिष्य पर कृपा करते हैं, तो ऐसे ही उसकी सबसे प्रिय वस्तु लेकर उसे कृतार्थ कर देते हैं।
 
          धन्य है वह शिष्य, जिसने एक क्षण भी गँवाए बिना पलभर में ही अपना अँगुष्ठ काटकर गुरु के चरणों में भेंट कर दिया, क्योंकि वह जानता था, कि यह शरीर भी गुरु का ही है, यह समस्त ज्ञान भी गुरुदेव का दिया है। उसने प्रत्यक्ष अनुभव किया था, कि गुरुदेव ने उसे किस प्रकार रात-रात भर जागकर, सारा दिनभर बैठकर, बिना खाए-पिए ज्ञान दिया, अन्यतम धनुर्धर बनाया और यह सब केवल गुरु कृपा से ही हुआ था।
 
          गुरु और शिष्य के सम्बन्ध की किसी अन्य से उपमा नहीं दी जा सकती है। महत्वपूर्ण यह नहीं है, कि एकलव्य ने अपना अँगूठा दक्षिणा स्वरूप दान कर दिया, यह तो मात्र एक क्रिया है जो शिष्य द्वारा की गई। अँगूठा ही क्या यदि द्रोण उसका सिर माँगते तो भी किञ्चित मात्र वह हिचकता नहीं और तत्क्षण काटकर चरणों में समर्पित कर देता। परन्तु उससे वह बात कहाँ बनती जो गुरु द्रोण चाहते थे? जो उनकी परिकल्पना थी, जो शिष्य को वरदान स्वरूप प्रदान करना था।
 
          यदि द्रोणाचार्य को एकलव्य यह दक्षिणा देने से इंकार भी कर देता, तो उस पर कोई बन्धन नहीं था, कोई दबाव नहीं था, वह तो स्वेच्छा से माँगी गई गुरु दक्षिणा थी। यदि यह घटना नहीं घटी होती, तो कौन जानता गुरु द्रोण के उस प्राणांश को, जो उनका तपोपुञ्ज स्वरूप था, उनका शिष्य था।
 
          चेतना पुञ्ज गुरु की मार्मिक वेदना को कोई समझ न पाया। एकलव्य से अँगूठा माँगने का अर्थ भी गुरु द्रोण भली प्रकार समझते थे, कि उन्होंने स्वयं एक शिष्य से अँगूठा दक्षिणा में माँगकर अपने नाम पर कलंक लगा दिया है। उन्होंने जान-बूझ कर यह कलंक अपने ऊपर मात्र इसलिए लिया, कि उनका शिष्य मृत्यु से अमृत्यु की ओर जा सके, इतिहास में उसका नाम अमिट हो सके।
 
          द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा में अँगूठा तो माँग लिया, किन्तु वर्षों से सीखी धनुर्विद्या गुरु द्रोण के आशीर्वाद से और अधिक मुखरित हो उठी। बिना अँगूठे के भी उसने धनुर्विद्या में पारंगतता प्राप्त कर ली और इतिहास गवाह है, कि जब भी श्रेष्ठ धनुर्धर का नाम आता है, तो एकलव्य का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है।
 
          इतिहास ने एकलव्य का कटा अँगूठा तो देखा, परन्तु क्या गुरु द्रोण का कटा हृदय कोई देख सका? अँगूठा लिया वह तो प्रकाश में आया, गुरु ने क्या दे दिया और समर्पण के साथ उसे कितना महान बना दिया, यह समाज ने याद नहीं किया। शिष्य को याद जितनी गुरु की रहती है, उससे भी कहीं अधिक याद गुरु को अपने एक-एक शिष्य की रहती है, क्योंकि गुरु के लिए सभी शिष्य समान होते हैं, लेकिन वे किसी भी शिष्य का अभिमान सहन नहीं कर सकते हैं। एक तरफ उन्होंने अर्जुन का अभिमान तोड़ा और दूसरी तरफ एकलव्य को अमरता प्रदान की।
 
          गुरु और शिष्य के सम्बन्ध तो पूर्ण निःस्वार्थ भावभूमि पर जनमते और पनपते हैं।
 
          एक आदमी जो कि छल, झूठ के वातावरण में पला, वह इन सम्बन्धों को केवल अपनी स्वार्थ दृष्टि से ही देखता है और समर्पित शिष्य यह जानता है, कि गुरुत्व शक्ति जो भौतिक शरीर रूप में व सूक्ष्म रूप में, इन दोनों स्थितियों में पूर्णरूपेण कार्य करती है, प्रत्येक प्रकार से अपने शिष्य का शुभ चिन्तन करती है, शिष्य के जीवन को सजाती-सँवारती है और उसको इतिहास पुरुष बनाने के लिए, उसके जीवन को हिमालय से भी ऊँचा उठाने के लिए गुरु स्वयं को द्रोण की तरह कीचड़ आक्षेप व लाञ्छनों में फँसा लेते हैं। फिर भी उन्हें सन्तोष होता है, कि वह अपने शिष्य को कुछ बना सके, अमर कर सके। शिष्य की दक्षिणा उतनी महत्वपूर्ण हो अथवा न हो, लेकिन गुरु का व्यक्तित्व बहुत गहन होता है, जिसे समझना इतना आसान नहीं होता। इसके लिए तो ज्ञान चक्षुओं की ही आवश्यकता होती है जो केवल समर्पण से ही मिल सकती है।
 
          कितने महान होते हैं गुरु, कि उनके त्याग की भनक तक भी शिष्य को होने नहीं पाती और न ही समाज समझ पाता है। गुरु अपनी आलोचना से विचलित नहीं होते। लेकिन क्या कोई गुरु पद की गरिमा को समझ सका है, गुरु का अपने शिष्य के प्रति प्रेम को समझ सका है?
 
          वर्तमान समय में भी यह तो केवल वह गुरु ही जान सकते हैं अथवा शिष्य एहसास कर सकता है, कि पूज्य गुरुदेव उसके साथ प्रतिक्षण किस तरह छाया के समान रहते हैं और जब शिष्य व्यथित होता है, गुरु चित्र के सम्मुख अपने विषाद निवेदित करता है, तब उसके विषाद हर्ष में परिवर्तित हो जाते हैं।
 
          यदि शिष्य में समर्पण और निष्ठा हो तथा उसके सामने देवता और सद्गुरुदेव मूर्ति में, चित्र रूप में स्थापित हों, तो उसे सदैव रक्षा और मार्गदर्शन प्राप्त होता ही है। यही एक प्रक्रिया है गुरु को अपने आतमघट में स्थापित करने की, जहाँ  शिष्य समर्पण भाव से गुरु साधना करता है।

ॐ नमो आदेश निखिलजी को आदेश आदेश आदेश ।।।


शनिवार, 1 जून 2019

तान्त्रोक्त धूमावती साधना


तान्त्रोक्त धूमावती साधना



          धूमावती जयन्ती समीप ही है। यह १० जून २०१९ को आ रही है। आप सभी को धूमावती जयन्ती की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          मन्त्र महार्णव, मन्त्र महोदधि, तन्त्रसार इत्यादि ग्रन्थों में दस महाविद्याओं की साधना पर विशेष बल दिया गया है। विस्तार से यह स्पष्ट किया गया है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकता अनुसार कैसे शक्ति सिद्धि प्राप्त कर सकता है? कौन-सी शक्ति की साधना करने से किस प्रकार का अभीष्ट फल प्राप्त होगा? काली, तारा, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी, भैरवी, षोडशी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला — प्रत्येक महाविद्या का विस्तृत विवेचन है।

           दस महाविद्याओं की साधना करना जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि मानी जाती है। यह दस प्रकार की शक्तियों की प्रतीक होती है और महत्वपूर्ण अवसर पर जीवन में जिस शक्ति तत्व की कमी होती है, उस कमी को पूरा करने के लिए महाविद्या साधना-उपासना करना जीवन का सौभाग्य माना जाता है।

          दस महाविद्याओं के क्रम में धूमावती सप्तमी महाविद्या है, यह शत्रु का भक्षण करने वाली महाशक्ति और दुःखों की निवृत्ति करने वाली है। बुरी शक्तियों से पराजित न होना और विपरीत स्थितियों को अपने अनुकूल बना देने की शक्ति साधक को इनकी साधना से ही प्राप्त होती है।

          धूमावती दस महाविद्याओं में से एक है, जिस प्रकार "तारा" बुद्धि और समृद्धि की, "त्रिपुर सुन्दरी" पराक्रम एवं सौभाग्य की सूचक मानी जाती है, उसी प्रकार "धूमावती" शत्रुओं पर प्रचण्ड वज्र की तरह प्रहार करने वाली मानी जाती है। वह अपने आराधक को अप्रतिम बल प्रदान करने वाली देवी है, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में सहायक सिद्ध होती ही है, यदि पूर्ण निष्ठा व विश्वास के साथ धूमावती साधना को सम्पन्न कर लिया जाए तो।

          महाविद्याओं का कोई भी रूप हो, फिर वो चाहे महाकाली हों, तारा हों या कमला हों, अपने आप में पूर्ण होता है। यह सभी उसी पराशक्ति आद्याशक्ति के ही तो विभिन्न रूप हैं। जब वो स्वयं अपनी कल्पना मात्र से इस सृष्टि का सृजन, पालन और संहार कर सकती हैं तो उसी परम पूर्ण के यह महाविद्या रूपी रूप कैसे अपूर्ण होंगे, इनमें भी तो निश्चित ही वही विशिष्टता होंगी ही, ना!

          महाविद्याओं के पृथक-पृथक १० रूपों को उनके जिन गुणों के कारण पूजा जाता है, वास्तव में वो उन्हें जनसामान्य को ना होने देने की गोपनीयता ही है, जो पुरातनकाल से सिद्धों और साधकों की परम्परा में चलती चली आई है। जब कोई साधक गुरु के संरक्षण में पूर्ण समर्पण के साथ साधना के लिए जाता है तो परीक्षा के बाद उसे इन शक्तियों की ब्रह्माण्डीयता से परिचित कराया जाता है और तब सभी कुँजियाँ उसके हाथ में सौंप दी जाती हैं। तभी उसे ज्ञात होता है कि सभी महाविद्याएँ सर्वगुणों से परिपूर्ण है और वे अपने साधक को सब कुछ देने का सामर्थ्य रखती हैं अर्थात यदि माँ कमला धन प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में साध्य हैं तो उनके कई गोपनीय रूप शत्रु मर्दन और ज्ञान से आपूरित करने वाले भी हैं।

          अब यह तो गुरु पर निर्भर करता है कि वो कब इन तथ्यों को अपने शिष्य को सौंपता है और यह शिष्य पर है कि वह अपने समर्पण से कैसे सद्गुरुदेव के हृदय को जीतकर उनसे इन कुँजियों को प्राप्त करता है। वास्तव में सत, रज और तम गुणों से युक्त ध्यान, दिशा, वस्त्र, काल और विधि पर ही उस शक्तियों के गुण परिवर्तन की क्रिया आधारित होती है। किसी भी महाविद्या को पूर्ण रूप से सिद्ध कर लेने के लिए साधक को एक अलग ही जीवनचर्या, आहार-विहार और खान-पान का आश्रय लेना पड़ता है, किन्तु जहाँ मात्र उनकी कृपा प्राप्त करनी हो तो यह नियम थोड़े सरल हो जाते हैं और यह हम सब जानते हैं कि विगलित कण्ठ से माँ को पुकारने पर वो आती ही हैं।

          माँ धूमावती के साथ भी ऐसा ही है, जनसामान्य या सामान्य साधक उन्हें मात्र अलक्ष्मी और विनाश की देवी ही मानते हैं, किन्तु जिनकी प्रज्ञा का जागरण हुआ हो वे जानते हैं कि आखिर इस महाविद्या का बाह्य परिवेश यदि इतना वृद्ध बनाया गया है तो क्या वह वृद्ध दादी या नानी माँ का परिवेश उन्हीं की भाँति वात्सल्यमयता से युक्त नहीं होगा।

          नीचे की पंक्तियों में माँ भगवती धूमावती से सम्बन्धित ऐसा ही साधना प्रयोग दिया जा रहा है, जिसे सम्पन्न करने पर ना सिर्फ जीवन में पूर्ण अनुकूलता प्राप्त हो जाती है, अपितु शत्रुओं से मुक्ति, आर्थिक उन्नति, कार्य क्षेत्र में सफलता, प्रभावकारी व्यक्तित्व और कुण्डलिनी जागरण जैसे लाभ भी प्राप्त होते हैं। विनाश और संहार के कथनों से परे यह गुण भी हम माँ भगवती धूमावती की साधना से स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।

साधना विधान :----------

          यह साधना धूमावती जयन्ती पर सम्पन्न करे अथवा इसे धूमावती सिद्धि दिवस या किसी भी रविवार को भी किया जा सकता है। यह साधना रात्रि में ही १० बजे के बाद की जाती है। स्नान करके बगैर तौलिए से शरीर को पोंछे या तो वैसे ही शरीर को सुखा लिया जाए या धोती के ऊपर धारण किए जाने वाले अंग वस्त्र से हल्के-हल्के शरीर सुखा लिया जाए और साधना के निमित्त सफ़ेद वस्त्र या बहुत हल्का पीला वस्त्र  धारण कर लिया जाए। ऊपर का अंगवस्त्र भी सफ़ेद या हल्का पीला ही होगा। धोती और अंगवस्त्र के अतिरिक्त कोई अन्तर्वस्त्र प्रयोग नहीं किया जाए। साधक-साधिका दोनों के लिए यही नियम है, महिला ऊपर साड़ी के रंग का ही ब्लाउज पहन सकती हैं। आसन सफ़ेद होगा, दिशा दक्षिण होगी।

          सर्वप्रथम पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का सामान्य पंचोपचार पूजन करें और गुरुमन्त्र का कम से कम चार माला जाप करें। फिर उनसे तान्त्रोक्त धूमावती साधना सम्पन्न करने हेतु मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लेकर साधना की पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

          तत्पश्चात भगवान गणपतिजी का स्मरण करके एक माला गणपति मन्त्र का जाप करें। फिर उनसे साधना की निर्विघ्न पूर्णता एवं सफलता के लिए निवेदन करें।

          इसके बाद एक पृथक बाजोट पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर एक लोहे या स्टील के पात्र में काजल से “धूं” बीज का अंकन करके उसके ऊपर एक सुपारी स्थापित कर दें और हाथ जोड़कर निम्न ध्यान मन्त्र का ११ बार उच्चारण करे —

धूम्रा मतिव सतिव पूर्णात सा सायुग्मे।
सौभाग्यदात्री सदैव करुणामयि:।। 

          इसके बाद उस सुपारी को माँ धूमावती का रूप मानते हुए, अक्षत, काजल, भस्म (धूपबत्ती या अगरबत्ती की राख, गोबर के उपलों की राख या पहले हुए किसी भी हवन की भस्म), काली मिर्च और तेल के दीपक से और उबाली हुई उड़द तथा फल के नैवेद्य द्वारा उनका पूजन करे। (यथा— ॐ धूं धूं धूमावत्यै अक्षत समर्पयामि, ॐ धूं धूं धूमावत्यै कज्जलं समर्पयामि...आदि आदि)

          तत्पश्चात उस पात्र के दाहिने अर्थात अपने बायीं ओर एक मिटटी या लोहे का छोटा पात्र स्थापित कर उसमें सफ़ेद तिलों की ढेरी बनाकर उसके ऊपर एक दूसरी सुपारी स्थापित करे और निम्न ध्यान मन्त्र का ५ बार उच्चारण करते हुए माँ धूमावती के भैरव अघोर रूद्र का ध्यान करे —

त्रिपाद हस्तं नयनं नीलांजनं चयोपमम्।
शूलासि सूची हस्तं च घोर दंष्ट्राटट् हासिनम्।।

          और उस सुपारी का पूजन काले तिल, अक्षत, धूप-दीप तथा गुड़ से करे तथा काले तिल डालते हुए ‘ॐ अघोर रुद्राय नमः’ मन्त्र का २१ बार उच्चारण करे। इसके बाद बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से निम्न मन्त्र का ५ बार उच्चारण करते हुए पूरे शरीर पर छिड़के –

धूमावती मुखं पातु  धूं धूं स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्यसुन्दरी।।
कल्याणी हृदये पातु हसरीं नाभि देशके।
सर्वांग पातु देवेशी निष्कला भगमालिना।।
सुपुण्यं कवचं दिव्यं यः पठेदभक्ति संयुतः।
सौभाग्यमतुलं प्राप्य जाते देवीपुरं ययौ।।

           इसके बाद जिस थाली में माँ धूमावती की स्थापना की थी, उस सुपारी को अक्षत और काली मिर्च मिलाकर निम्न मन्त्र की आवृत्ति ११ बार कीजिए अर्थात क्रम से हर मन्त्र ११-११ बार बोलते हुए अक्षत मिश्रित काली मिर्च डालते रहे।
उदाहरण -----       ॐ  भद्रकाल्यै नमः।

          मन्त्र को ११ बार बोलते हुए अक्षत और साबुत काली मिर्च का मिश्रण अर्पित करे, फिर दूसरा मन्त्र ११ बार बोलते हुए पुनः मिश्रण चढाएं। फिर क्रमशः तीसरा मन्त्र, चौथा, पाँचवाँ, छठवाँ, सातवाँ और आठवाँ मन्त्र ११-११ बार बोलते हुए अक्षत और काली मिर्च का मिश्रण अर्पित करते जाएं -----

ॐ  भद्रकाल्यै नमः।
ॐ  महाकाल्यै नमः।
ॐ  डमरूवाद्यकारिणीदेव्यै नमः।
ॐ  स्फारितनयनादेव्यै नमः।
ॐ  कटंकितहासिन्यै नमः।
ॐ  धूमावत्यै नमः।
ॐ  जगतकर्त्री नमः।
ॐ  शूर्पहस्तायै नमः।

          इसके बाद  निम्न मन्त्र का जाप रुद्राक्ष माला से ५१ माला करें, यथासम्भव एक बार में ही यह जाप हो सके तो अतिउत्तम  होगा —

मन्त्र :-------------

          ।। ॐ  धूं धूं धूमावत्यै फट् स्वाहा ।।

OM DHOOM DHOOM DHOOMAVATYAI PHAT SWAAHA.

          मन्त्र जाप के बाद मिट्टी या लोहे के हवन कुण्ड (हवन कुण्ड ना हो तो कोई भी कटोरा, कढ़ाई, तवा आदि भी लिया जा सकता है) में लकड़ी जलाकर १०८ बार घी व काली मिर्च के द्वारा आहुति डाल दें। आहुति के दौरान ही आपको आपके आसपास एक तीव्रता का अनुभव हो सकता है और पूर्णाहुति के साथ अचानक मानो सब कुछ शान्त हो जाता है। इसके बाद आप पुनः स्नान करके ही सोने के लिए जाए और दूसरे दिन सुबह आप सभी सामग्री को बाजोट पर बिछे वस्त्र के साथ ही विसर्जित कर दें। जाप माला को कम से कम २४ घण्टे नमक मिश्रित जल में डुबाकर रखे और फिर साफ़ जल से धोकर तथा उसका पूजन कर अन्य कार्यों में प्रयोग करें। यदि बाद में भी कभी इस प्रयोग को करना हो तो नवीन सामग्री (माला छोड़कर) से उपरोक्त सारी प्रक्रिया पुनः करना पड़ेगा। इस प्रयोग को करने पर स्वयं ही अनुभव हो जाएगा कि आपने किया क्या है? कैसे परिस्थितियाँ आपके अनुकूल हो जाती है, यह तो स्वयं अनुभव करने वाली बात है।

          आपकी साधना सफल हो और आपकी मनोकामना पूर्ण हो। मैं सद्गुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्दजी के आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

          इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश ।।।