मंगलवार, 13 नवंबर 2018

निखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच साधना


निखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच  साधना


         
           निखिल संन्यास दिवस निकट ही है। यह इस बार २३ नवम्बर २०१८ को आ रहा है। आप सभी को निखिल संन्यास दिवस की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          पूज्यपाद सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्दजी मन्त्र, तन्त्र और साधना के क्षेत्र में प्रामाणिक और चेतनावान व्यक्तित्व माने गए हैं। सूर्य विज्ञान, पारद विज्ञान तथा परा विज्ञान के अद्वितीय ज्ञाता रहे हैं। अपनी तपस्या एवं साधना के बल से किसी के भी दुर्भाग्य की रेखा को सौभाग्य के रूप में बदलने की क्षमता रखते हैं। योग के माध्यम से समस्त ब्रह्माण्ड जिनकी लीला भूमि है,भगवत्पाद सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्दजी ने श्रीकृष्ण के बाद सम्मोहन विज्ञान को सम्पूर्ण रूप से अपने भीतर संजोया है, ऐसे सिद्धाश्रम संस्पर्शित व्यक्तित्व जो वर्तमान में डॉ. नारायणदत्त श्रीमालीजी के रूप में जाने जाते हैं, ने साधारण गृहस्थ की तरह रहकर भौतिक और आध्यात्मिक धरोहरों को साधनाओं के माध्यम से पुनर्जीवित करके समस्त भारतीय ज्ञान और तन्त्र विद्या के वैज्ञानिक स्वरूप को सार्वजनीन किया है। तन्त्र, मन्त्र और ज्योतिष ज्ञान को जो कुछ वर्षों पूर्व समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था, आज उन्होंने उनके सम्मान को पुनः स्थापित करके गौरवान्वित किया है। जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए इन साधनाओं या सिद्धियों का कभी उपयोग नहीं किया, ऐसे सिद्धाश्रम के प्राणश्चेतनायुक्त अद्वितीय व्यक्तित्व का लोकोपकारी अधिकाधिक कार्य अप्रत्यक्ष ही होता है, जो निरन्तर अपने को भीड़ से छुपाकर निर्मल गंगा की तरह सतत क्रियाशील हैं, प्रवाहमान हैं, ऐसे चेतनापुंज व्यक्तित्व के लिए कुछ भी कहना या लिखना समग्र नहीं होगा।

         आज विज्ञान ने समग्र मानव जाति को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ केवल मौत का ही खौफ़ है, भय है, जहाँ से निकलने के लिए कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है, इस घटाटोप अन्धकार में दूर-दूर तक आशा की किरणें दृष्टिगोचर नहीं हो रही है। विज्ञान के चकाचौंध से त्रस्त मानव अपने मार्गदर्शन के लिए ऐसे महामानव की तलाश कर रहा है, जिन की छत्रछाया में यह समस्त विश्व शान्ति और सौहार्द्र का पाठ पढ़ सके। इस भयावह स्थिति में विश्व को विनाश से बचाने के लिए एकमात्र पूज्यपाद गुरुदेव डॉ. नारायणदत्त श्रीमालीजी ही उपयुक्त व्यक्तित्व हैं, जो योग एवं तन्त्र बल से अभय दान दे सकते हैं।

         सिद्धाश्रम में या अन्यत्र अनेक योगियों और सैकड़ों वर्षों की आयु प्राप्त संन्यासियों ने आपकी स्तुति की है, आपके चरित्र का और गुणों का वर्णन किया है, फिर भी उन्होंने स्वीकार किया है कि आपके ज्ञान की गहराइयों को जितना ही ज्यादा जानने का प्रयास करते हैं, उतनी ही गहराई और प्रतीत होती है। महर्षि पुलस्त्य, महर्षि विश्वामित्र ज्ञानानन्द आदि भी आपकी गम्भीरता को नहीं समझ सके। वे सैकड़ों-हजारों वर्षों की साधना करने के बाद भी आप का  सौवां हिस्सा भी अनुभव नहीं कर पाए। वे जितनी और ज्यादा तपस्या करते हैं, उतनी ही आपकी महिमामण्डित विराटता का अनुभव करने लग जाते हैं। तब वे आपके सामने अपने आपको बौना पाते हैं, क्योंकि आप अपने आप में पूर्ण ब्रह्म स्वरूप हैं और पूर्ण ब्रह्म अपने आप में अथाह और असीम है। उसका जितना भी अंश जिसको प्राप्त हो जाता है, वह अपने आप में अद्वितीय बन जाता है, हजार-हजार जन्म लेकर भी आप की पूर्णता को शब्दों में बाँध पाना कठिन है।

         ऐसे महामानव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्दजी के गुणगान में सहस्त्रों स्तोत्र रचे गए। ऋषि, महर्षि तो क्या देवी-देवताओं ने भी स्तोत्र के माध्यम से अपने को सौभाग्यशाली बनाया। ऐसे ही स्तोत्रों में से एक चैतन्य एवं शीघ्र फलदायी स्तोत्र है निखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच, जिसका मात्र पाठ करके ही समस्त समस्याओं व बाधाओं का अन्त किया जा सकता है।

          कभी-कभी व्यक्ति का जीवन बहुत ही असुरक्षित-सा हो जाता है, वह अकारण ही शत्रुओं से घिर जाता है। आज का सामाजिक परिवेश इतना घिनौना और भयास्पद है कि कभी भी आपके साथ कुछ भी घटित हो सकता है। आज तो जीवन इतना सस्ता है, जितना पहले कभी नहीं रहा। कभी हम अकारण ही विवाद में फँस जाते हैं, मुकदमा शुरु हो जाता है, फिर तो जीवन बिलकुल भी निरापद नहीं रह पाता।  इस तरह निरन्तर तनाव की स्थिति बनी रहती है, जो कि मृत्यु से भी अधिक दुष्कर अनुभव होती है। कभी आपके ऊपर तन्त्र प्रयोग हो जाता है, चलता हुआ कारोबार भी रुक जाता है, यह विवाद लड़ते-लड़ते इतना भीषण हो जाता है, जहाँ जीवन को खतरा हो जाता है।  ऐसी स्थितियों से निजात पाने के लिए इस कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह कवच निश्चित रूप से आपको भय या विवाद से मुक्ति प्रदान करेगा।

          यह अद्भुत कवच गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द के तपोबल से प्रदीप्त महामन्त्र है, प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नानोपरानत शुद्ध वस्त्र धारण कर संक्षिप्त गुरु पूजन कर इसका पाठ करने से साधक को सुरक्षा, आनन्द, सौभाग्य तथा गुरुदेव का तेज प्राप्त होता है। दृढ़ निश्चय से युक्त होकर शुद्ध अन्तःकरण से सम्पन्न किया गया इस कवच का विधिवत् अनुष्ठान जीवन की विकटतम परिस्थितियों में भी साधक को विजय प्रदान करने में सक्षम है।

          यदि सम्भव हो तो प्रतिदिन इसका एक पाठ गुरुपूजन एवं गुरुमन्त्र जाप के बाद करना ही चाहिए। किसी भी आपत्ति के आने से पूर्व ही उससे बचने का उपाय करना बुद्धिमानी है। आपत्ति कभी बताकर नहीं आती, इसलिए इस कवच की उपयोगिता आपके लिए है। इसका समुचित पाठ करके आप स्वयं सुरक्षित होइए तथा अपने परिवार को भी सुरक्षित करें। जीवन में विपत्तियों से भागना कायरता है। उनका साहस पूर्वक मुकाबला इन्हीं उपायों से किया जाता है। आप भी ऐसा कर सकते हैं।

कवच साधना विधान :-----------

          यह साधना निखिल जयन्ती, गुरु पूर्णिमा या निखिल संन्यास दिवस से आरम्भ की जा सकती है। इसके अतिरिक्त इसे किसी भी सोमवार, मंगलवार या गुरूवार से भी शुरू किया जा सकता है। यह ११ दिन की साधना है, जिसमें इस कवच के नित्य १०८ पाठ करना आवश्यक है।

          साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में अथवा रात्रि काल में स्नानादि से निवृत्त होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके स्वच्छ आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने बाजोट पर पीला या लाल वस्त्र बिछाकर उस पर पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का चित्र स्थापित कर दें। इसके साथ ही धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर दें।

          सर्वप्रथम भगवान गणपतिजी का स्मरण करके सामान्य पूजन करें। फिर "ॐ वक्रतुण्डाय हुम् फट्" मन्त्र की एक माला जाप करें और भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

          तदुपरान्त पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का स्मरण करके सामान्य पूजन करें। फिर गुरुमन्त्र की कम से कम चार माला जाप करें। फिर सद्गुरुदेवजी से निखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच साधना सम्पन्न करने के लिए मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लें और उनसे साधना की पूर्णता एवं सफलता के लिए निवेदन करें।

          इसके बाद दाहिने हाथ में जल, कुमकुम तथा अक्षत लेकर निम्नानुसार संकल्प करें -----

          ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महाप्रभावस्य द्वितीय परार्धे श्वेतवाराहकल्पे भरतखण्डे पुण्य क्षेत्रे अमुक गोत्रीयः (अपना गोत्र बोलें) अमुक शर्मा हं (अपना नाम बोलें) अस्य श्रीनिखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवचस्य सर्व आपद् विनाशाय पाठं अहं करिष्ये।

          और फिर जल को भूमि पर छोड़ दें।

          तत्पश्चात दोनों हाथ जोड़कर निम्नानुसार ध्यान करें -----

ॐ आनन्दमानन्द करं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधरूपं।
  योगीन्द्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद्गुरुं नित्यमहं नमामि।।

          इस प्रकार ध्यान के पश्चात श्रीनिखिलेश्वरानन्द सुरक्षा कवच के १०८ पाठ सम्पन्न करें -----

मूल कवचम्

ॐ शिरो मे पातु निखिलः सर्व सम्पत् यशस्करः।
     नेत्रे पातु निरालम्बः नर चित्त प्रमोदकः।।१।।
     श्रुतौ रक्षेत् सुसंवैद्यः दुःख-ताप निवारकः।
     नासिके च द्वयं पातु नित्यं पातु निरंजनः।।२।।
     गण्डौ पातु गणाध्यक्षः गणेशः गणनायकः।
     मस्तकं परमोदारः पातु च परिनिष्ठितः।।३।।
     जिह्वां रक्षेत् जगज्येष्ठः जगन्मंगलदायकः।
     वाचं मे पातु विश्रब्धः वेद वैद्य विशारदः।।४।।
     कण्ठदेशं कलानाथः नित्य कल्पः नियामकः।
     बाहु मूलं सदा पातु ब्रह्माण्डस्य च नायकः।।५।।
     कुमुदमाली करौ पातु काव्यशास्त्र कलात्मकः।
     हृदयं हरि प्रियः पातु अंशौ च अखिलाधरः।।६।।
     नाभिं "निं" सदा रक्षेत् सर्वांगं सर्वसन्धिषु।
     गृहे अरण्ये सदा पायात् दुष्ट दैव विघातकः।।७।।
     मुखं पातु महोपायः महोल्लासः महातपः।
     कमनीयः कटिं रक्षेत् कनकांगः कलाधरः।।८।।
     वाचं मुखं पदं रक्षेत् विश्वकर्मा विशोधनः।
     लिंगं लोकोत्तरः पातु लोहांगः लोक विश्रुतः।।९।।
     मूष्क द्वयं महामायः रक्षेच्च मनमोहनः।
     जंघायुग्मं सदा पातु महातेजः महातपः।।१०।।
     पृष्ठं पातु च पूतात्मा पुण्यतीर्थ निषेवितः।
     जिह्वां च जपोपेतः गुल्फौ च गण सेवितः।।११।।
     पादोर्ध्वे सदा पातु पुत्र-पौत्र विवर्धनः।
     रक्त विन्दून् प्ररक्षेच्च राजीवायतलोचनः।।१२।।
     मनो मे पातु "खिं" बीजं सर्व दिक् च दिशां पतिः।
     "लं" बीजं सदा पातु बुद्धीन्द्रियं वचांसि मे।।१३।।

फलश्रुति

     राजकार्ये विवादे च पंच वारं पठेत् तु यः।
     सर्वत्र विजय भूतिः नात्र संशय संशयः।।१।।
     सर्वकार्ये सभामध्ये अष्ट वारं पठेत् तु यः।
     सर्वसिद्धिः भवेत् शीघ्रं आपदुद्धारकं हि तत्।।२।।
     इदं तु कवचं पुण्यं यः पठेत् गुरु सन्निधौ।
     तस्य सर्वत्र रक्षा स्यात् नात्र काचित् विचारणा।।३।।

          पहले पाठ में मूल कवच और फलश्रुति दोनों का पाठ करें। बीच के पाठों में मात्र मूल कवच का पाठ करें और अन्तिम पाठ में पुनः मूल कवच एवं फलश्रुति दोनों का पाठ करें।

          एक सौ आठ पाठ पूरे होने के पश्चात एक आचमनी जल छोड़कर सम्पूर्ण जाप (पाठ) पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी को ही समर्पित कर दें। इस प्रकार नित्य ११ दिन तक यह साधना सम्पन्न करें।
    
          जब आप किसी भी साधना को करते हैं तो यह आवश्यक है कि आप मूल साधना को कम-से-कम ४-५ बार करें और उसके बाद उसकी निरन्तरता बनाए रखने के लिए नित्य कवच या मन्त्र का कुछ मात्रा में पाठ या जाप करें। विशेषतया कवच या स्तोत्र आदि की सिद्धि १००० पाठ से हो जाती है और इस तरह ४-५ बार में कुल चार या पाँच हजार पाठ सम्पन्न हो जाते हैं। कुछ कवचों और स्तोत्रों में उनकी पाठ संख्या दी गई होती है। इन सबके बाद ही आप कवच या स्तोत्र में लिखे प्रयोग आदि को करने की पात्रता अर्जित करते हैं।

           आपकी साधना सफल हो और आपको पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो। मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए ऐसी ही कामना करता हूँ।

               इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिलजी को आदेश आदेश आदेश।।।

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

साबर लक्ष्मी आबद्ध प्रयोग


साबर लक्ष्मी आबद्ध प्रयोग



          पंच दिवसीय दीपावली महापर्व निकट ही है। इसका आरम्भ ५ नवम्बर २०१८ से हो रहा है और इसका समापन ९ नवम्बर २०१८ को होगा। आप सभी को दीपावली महापर्व की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          धर्म जीवन का आधार है, लेकिन धर्म से जीवन जीने के लिए प्रधान आवश्यकता अर्थ की रहती है और इसीलिए इसे दूसरा पुरुषार्थ कहा गया है। जीवन प्राप्त हुआ है तो धर्म के साथ जीवन जीते हुए अर्थ की प्राप्ति की जाए, उससे जीवन चलाया जाए, तभी जीवन का तीसरा और चौथा पुरुषार्थ काम और मोक्ष सफल हो सकते हैं।

          सामान्य रूप से अर्थ का तात्पर्य धन अर्थात रुपया, पैसा मान लिया गया है, जबकि यह अपने आप में एक अत्यन्त सीमित अर्थ है। केवल रुपये, पैसे इत्यादि से जीवन चल ही नहीं सकता है। यह तो अर्थ का एक छोटा-सा रूप है और इसीलिए हमने हिन्दू मान्यता में अर्थ का तात्पर्य लक्ष्मी को माना है। सामान्य रूप से लक्ष्मी का जो स्वरूप देखते हैं, वास्तविक रूप में लक्ष्मी का स्वरूप उससे बिल्कुल अलग है। लक्ष्मी के आठ स्वरूपों को जीवन का आधार, अर्थ का आधार माना गया है। लक्ष्मी के इन आठ स्वरूपों को अष्टलक्ष्मी कहा गया है और जिसके जीवन में अर्थ अपने पूरे स्वरूप में, अष्ट लक्ष्मी के स्वरूप में विद्यमान है, वही जीवन पूर्ण कहा गया है।

          लक्ष्मी की कृपा से ही मनुष्य सांसारिक जीवन में अपने तीसरे पुरुषार्थ काम का पूर्ण रूप से उपयोग कर वह मोक्ष मार्ग पर गतिशील हो सकता है। लक्ष्मी का यह स्वरूप जो कि विद्या माया स्वरूप हैं, वह मनुष्य को निरन्तर कर्म पथ पर अग्रसर करते हैं।

          लक्ष्मी मनुष्य जीवन की आवश्यकता है और जीवन का सौन्दर्य भी है। प्रत्येक युग में लक्ष्मी की महत्ता रही है और रहेगी ही। वर्तमान में जब मनुष्य की बाह्य आवश्यकताएँ बढ़ती जा रही है, तब लक्ष्मी की कामना तो होगी ही।

          लक्ष्मी का दूसरा नाम चंचला भी है। कई बार अत्यधिक प्रयास करने पर भी जब लक्ष्मी घर में टिक नहीं पाती है, धनागम होता है, कहाँ जाता है? पता ही नहीं चलता है कमाई से अधिक खर्च होता है ऋण भार से व्यक्ति दबता चला जाता है। तब जीवन में आनन्द, मस्ती और उमंग समाप्त हो जाता है।

          यह सर्वमान्य नियम भी नहीं है कि प्रयत्न करो और लक्ष्मी आती रहे। कई बार प्रयास करने के बाद भी धन का आगमन नहीं हो पाता। जीवन में जूझते रहते हैं, फिर भी घर की दरिद्रता समाप्त नहीं होती। इस प्रकार घर में अविश्वास, बिखराव बढ़ता चला जाता है और घर के घर टूटते चले जाते हैं, उजड़ते चले जाते हैं।

          इस स्थिति से उबरने के लिए मनुष्य को साबर साधना ही अधिक कारगर सिद्ध हो सकती है और हुई है। यह वही प्रयोग है जो सबके लिए आवश्यक है।

साधना विधि :----------

          यह साधना प्रयोग आप धन त्रयोदशी से आरम्भ करें। यदि आपके लिए यह सम्भव न हो तो इसे किसी भी पूर्णिमा की मध्य रात्रि से शुरू किया जा सकता है।

          साधक रात के लगभग ११ बजे के बाद स्नान करके लाल वस्त्र धारण कर लें। फिर लाल आसन बिछाकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाएं। अपने सामने किसी बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर एक ताँबे अथवा स्टील की थाली (बड़ी प्लेट) रखें। इस थाली में कुमकुम से ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण का निर्माण करे। त्रिकोण के एक कोने में ऊपर पाँच "हकीक पत्थर" रखें, नीचे के दूसरे कोने में पाँच "मूँगे के टुकड़े" रखें तथा नीचे के तीसरे कोने में पाँच "रुद्राक्ष के दाने" रख लें।

          अब सर्वप्रथम साधक पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी का ध्यान करके गुरुमन्त्र का यथाशक्ति जाप करे। फिर सद्गुरुदेवजी से साबर लक्ष्मी आबद्ध प्रयोग सम्पन्न करने हेतु मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लेकर उनसे साधना की सफलता के लिए प्रार्थना करें।



           इसके बाद में त्रिकोण के प्रत्येक कोने पर तेल के दीपक जलाकर रखें। त्रिकोण के मध्य में सरसों की ढेरी बनाकर एक चौमुखा तेल का दीपक जलाकर रखें। इसके बाद हकीक माला से निम्न मन्त्र की सात माला मन्त्र जाप करें -----

साबर मन्त्र :----------

॥ ओम नमो आदेश श्री गुरु को
    गजानन वीर बसे मसान
    अब दो ऋद्धि का वरदान
    जो-जो मांगू सो-सो आन
    पाँच लड्डू सिर पर सिन्दूर
    हाट-बाट का माटी मसान की
    सब ऋद्धि हमारे पास पठेओ
    शब्द साँचा फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ॥

OM NAMO AADESH SHRI GURU KO
GAJAANAN VEER BASE MASAAN
AB DO RIDDHI KA VARDAAN
JO-JO MAANGU SO-SO AAN
PAANCH LADDOO SIR PAR SINDOOR
HAAT-BAAT KA MAATI MASAAN KI
SAB RIDDHI HAMARE PAAS PATHEO
SHABD SAANCHA PHURO MANTRA ISHWARO VAACHA.

          मन्त्र जाप के पश्चात एक आचमनी जल भूमि पर छोड़कर समस्त जाप समर्पित कर दें। इस साधना क्रम को नित्य तीन दिनों तक सम्पन्न करें। प्रतिदिन मन्त्र जाप पूरा होने पर रात्रि में साधक वहीं पर सो जाए।

          चौथे दिन प्रातः सभी सामग्री लाल वस्त्र में बाँधकर घर में रख ले। मन्त्र जप द्वारा इस साधना को जब आप पूरा कर ले, तब धनागम का कोई न कोई मार्ग सुलभ होगा। लक्ष्मी की प्राप्ति इससे होती ही है। यह प्रयोग प्रामाणिक और परीक्षित है। यही इसकी विशेषता है। आप करें और सफलता प्राप्त करें, यह आपका सौभाग्य होगा।

          आपके लिए यह दीपावली महापर्व मंगलमय हो और यह दीपावली आप के जीवन में धन-धान्य, सुख-समृद्धि, यश एवं अपार खुशियाँ लेकर आए। मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए ऐसी ही कामना करता हूँ।

          इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिलजी को आदेश आदेश आदेश ॥

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

दीपावली के अचूक प्रयोग (भाग-२)


दीपावली के अचूक प्रयोग (भाग-२)

          पञ्च दिवसीय दीपावली महापर्व निकट ही है। इसका आरम्भ ५ नवम्बर २०१८ से हो रहा है और इसका समापन ९ नवम्बर २०१८ को होगा। आप सभी को दीपावली महापर्व की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          दीवालीजिसे दीपावली के नाम से भी जाना जाता हैसाल का सबसे प्रसिद्ध त्योहार है। दीवाली उत्सव धनतेरस से शुरू होता है और भैया दूज पर समाप्त होता है। अधिकतर प्रान्तों में दीवाली की अवधि पाँच दिनों की होती हैजबकि महाराष्ट्र में दीवाली उत्सव एक दिन पहले गोवत्स द्वादशी के दिन शुरू हो जाता है।

          इन पाँच दिनों के दीवाली उत्सव में विभिन्न अनुष्ठानों का पालन किया जाता है और देवी लक्ष्मी के साथ-साथ कई अन्य देवी देवताओं की पूजा की जाती है। हालाँकि दीवाली पूजा के दौरान देवी लक्ष्मी सबसे महत्वपूर्ण देवी होती हैं। पाँच दिनों के दीवाली उत्सव में अमावस्या का दिन सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है और इसे लक्ष्मी पूजालक्ष्मी-गणेश पूजा और दीवाली पूजा के नाम से जाना जाता है।

          दीवाली पूजा केवल परिवारों में ही नहींबल्कि कार्यालयों में भी की जाती है। पारम्परिक हिन्दु व्यवसायियों के लिए दीवाली पूजा का दिन सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस दिन स्याही की बोतलकलम और नये बही-खातों की पूजा की जाती है। दवात और लेखनी पर देवी महाकाली की पूजा कर दवात और लेखनी को पवित्र किया जाता है और नये बही-खातों पर देवी सरस्वती की पूजा कर बही-खातों को भी पवित्र किया जाता है।

          दीवाली के दिन लक्ष्मी पूजा करने के लिए सबसे शुभ समय सूर्यास्त के बाद का होता है। सूर्यास्त के बाद के समय को प्रदोष कहा जाता है। प्रदोष के समय व्याप्त अमावस्या तिथि दीवाली पूजा के लिए विशेष महत्वपूर्ण होती है। अतः दीवाली पूजा का दिन अमावस्या और प्रदोष के इस योग पर ही निर्धारित किया जाता है। इसलिए प्रदोष काल का मुहूर्त लक्ष्मी पूजा के लिए सर्वश्रेस्ठ होता है और यदि यह मुहूर्त एक घटी के लिए भी उपलब्ध हो तो भी इसे पूजा के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

          ४. पारद लक्ष्मी प्रयोग

          कोई भी व्यक्ति कभी दुर्भाग्यशाली नहीं होता है। सारा खेल समय का है। फिर भी यदि आपके मन में यह बात घर कर गई है कि आप दुर्भाग्यशाली हैं तो आप दीपावली की रात्रि में अपने घर में पारद की माँ लक्ष्मी की मूर्ति को स्थान दें।

          सर्वप्रथम आप किसी पाटे (बाजोट) पर लाल रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर हल्दी से रँगे पीले चावलों से “स्वस्तिक” बनाएं। स्वस्तिक के ऊपर ताँबे की प्लेट में हल्दी से ही “श्रीं” लिखकर गुलाब पुष्प की पँखुड़ियों पर माँ पारदेश्वरी लक्ष्मी को स्थान दें तथा दीपावली की रात्रि से लेकर लगातार ४० दिन तक ११ माला नित्य निम्न मन्त्र का जाप करें -----

मन्त्र :----------

॥ ॐ ऐं ऐं श्रीं श्रीं ह्रीं ह्रीं पारदेश्वरी सिद्धि ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं ऐं ऐं ॐ ॥

OM AYEIM AYEIM SHREEM SHREEM HREEM HREEM PAARDESHWARI SIDDHI HREEM HREEM SHREEM SHREEM AYEIM AYEIM OM.

           ४० वें दिन किसी सुहागिन को भोजन कराएं और यथाशक्ति दक्षिणा आदि भेंट देकर सन्तुष्ट करें।

          पारदेश्वरी महालक्ष्मी अपने उपासकों को धनऐश्वर्यभूमिमान-सम्मान, पुत्र, बन्धु-बान्धवआयु एवं बुद्धि प्रदान करती है। वह स्वयं शक्ति स्वरूपा है।

           इस उपाय से आपके मन का सारा शक निकल जाएगा तथा आप स्वयं ही स्वीकार करेंगे कि आप से बड़ा कोई भाग्यशाली नहीं है।

          ५. मोती शंख प्रयोग

          मोती शंख भी सामान्य शंख जैसा ही होता हैपरन्तु इसमें चमक मोती जैसी होती है। इसीलिए इसको मोती शंख कहा जाता है।

          दीपावली की रात्रि में दीपावली पूजन के साथ ही  मोती शंख और एक चाँदी के सिक्के का भी पूजन करें। जब दीपावली पूजन के बाद सभी लोग पूजास्थल से हट जाएं तो आप  मोती शंख को उठाकर माँ भगवती लक्ष्मी से अपनी सम्पन्नता का निवेदन करते हुए शंख को अपने माथे से लगाकर उसमें चाँदी का सिक्का रख दें और “श्रीदक्षिणलक्ष्मी स्तोत्र” का ५१ बार पाठ करें -------

ॐ त्रैलोक्य पूजिते देवि कमले विष्णुवल्लभे।

   यथा त्वमचला कृष्णे तथा भव मयि स्थिरा॥

   कमला चञ्चला लक्ष्मीश्चला भूतिर्हरिप्रिया।

   पद्मा पद्मालया सम्पदुच्चैः श्रीपद्मधारिणी॥

   द्वादशैतानि नामानि लक्ष्मीं सम्पूज्य यः पठेत्।

   स्थिरा लक्ष्मीः भवेतस्य पुत्रदारादिभिः सह॥

          फिर निम्न मन्त्र का १०८ बार जाप करें -------

मन्त्र :---------------

॥ ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ॐ ॥

OM SHREEM HREEM SHREEM KAMALE KAMALAALAYE PRASEED-PRASEED SHREEM HREEM SHREEM MAHAALAKSHMYEI NAMAH OM.

          प्रत्येक मन्त्र जाप के साथ ही मोती शंख में एक चावल का दाना डालते जाएं। इसमें यह ध्यान रखें कि चावल का दाना साबुत होखण्डित न हो।

          जब मन्त्र जाप पूर्ण हो जाए तो शंख को लाल वस्त्र में लपेटकर पूजास्थल में ही रख दें। अगले दिन सांध्यकाल में फिर माँ भगवती लक्ष्मी की पूजनकर यही प्रक्रिया अपनाएं। यह प्रक्रिया तब तक चलेगीजब तक मोती शंख चावलों से भर न जाए।

          जिस दिन शंख चावलों से भर जाएउस दिन उसे उसी लाल वस्त्र में बाँधकर पुनः श्रीलक्ष्मी स्तोत्र  का  ५१ बार पाठ करके अपने धन रखने के स्थान पर रख दें। फिर २१ दिन तक नित्य अगरबत्ती अवश्य दिखाएं।

          इस प्रयोग से आपको माँ भगवती लक्ष्मी की कृपा तो अवश्य प्राप्त होगीसाथ ही आपका निवास वास्तुदोष से भी मुक्त रहेगा।

          ६. कनकधारा प्रयोग

          अब श्री कनकधारा यन्त्र से सम्बन्धित एक प्रयोग प्रस्तुत किया जा रहा है। आर्थिक समृद्धि के लिए यह यन्त्र बहुत अधिक शक्तिशाली है। इसकी स्थापना का तरीका भी बहुत ही सामान्य रूप से बताया जा रहा है।

          दीपावली की रात्रि में आप पूजन के समय श्री कनकधारा यन्त्र को पंचतत्व (दूधदहीघीशहद और शक्कर) से स्नान करवाकर उसका भी पूजन करें। फिर लाल वस्त्र पर चावल की ढेरी बनाकर उस पर इस यन्त्र को स्थापित करें। यन्त्र को कुमकुम से तिलक करके दीपधूप और नैवेद्य अर्पित करें। इसके साथ ही २१ आँवले समर्पित करें। आँवले सूखे अथवा हरेकैसे भी हो सकते हैं।

          इसके बाद आप रुद्राक्ष अथवा कमलगट्टे की माला से निम्न मन्त्र का ११ माला जाप करें -------

मन्त्र :-----------

॥ ॐ ह्रीं श्रीं कनकधारायै श्रीं ह्रीं नमः ॥

OM HREEM SHREEM KANAKDHAARAAYEI SHREEM HREEM NAMAH.

           तत्पश्चात श्रीकनकधारा स्तोत्र” के ११ पाठ सम्पन्न करें -------

॥ श्रीकनकधारा स्तोत्रम् ॥

ॐ अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।

अङ्गीकृताऽखिल विभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥१॥

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गताऽगतानि।

माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥२॥

विश्वामरेन्द्रपद विभ्रमदानदक्षम् आनन्द हेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।

ईषन् निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धं इन्दीवरोदर सहोदरं इन्दिरायाः॥३॥

आमीलिताक्षं अधिगम्य मुदा मुकुन्दं आनन्दकन्दं अनिमेषं अनङ्गतन्त्रम्।

आकेकरस्थित कनीनिकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः॥४॥

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।

कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणं आवहतु मे कमलालयायाः॥५॥

कालाम्बुदालि ललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव।

मातुः समस्त जगतां महनीयमूर्तिर्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः॥६॥

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान् माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन्।

मय्यापतेत् तदिह मन्थर मीक्षणार्धं मन्दालसञ्च मकरालय कन्यकायाः॥७॥

दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारां अस्मिन्नकिञ्चन विहङ्ग शिशौ विषण्णे।

दुष्कर्म-घर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयन अम्बुवाहः॥८॥

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।

दृष्टिः प्रहृष्ट कमलोदर दीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टरायाः॥९॥

गीर्देवतेति गरुडध्वज सुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।

सृष्टि-स्थिति-प्रलय-केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैक गुरोस्तरुण्यै॥१०॥

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्म-फलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीय गुणार्णवायै।

शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्र निकेतनायै पुष्टयै नमोऽस्तु पुरुषोत्तम वल्लभायै॥११॥

नमोऽस्तु नालीक निभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधि जन्म भूत्यै।

नमोऽस्तु सोमामृत सोदरायै नमोऽस्तु नारायण वल्लभायै॥१२॥

नमोऽस्तु हेमाम्बुज पीठिकायै नमोऽस्तु भूमण्डल नायिकायै।

नमोऽस्तु देवादिदयापरायै नमोऽस्तु शार्ङ्गायुध वल्लभायै॥१३॥

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै नमोऽस्तु विष्णोरुरस स्थितायै।

नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै॥१४॥

नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै नमोऽस्तु भूत् भुवनप्रसूत्यै।

नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै नमोऽस्तु नन्दात्मज वल्लभायै॥१५॥

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रिय नन्दनानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरुहाक्षि।

त्वद् वन्दनानि दुरिताहरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु मान्ये॥१६॥

यत्कटाक्ष समुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थ सम्पदः।

सन्तनोति वचनाऽङ्ग मानसैस्त्वां मुरारि हृदयेश्वरीं भजे॥१७॥

सरसिज निलये सरोजहस्ते धवलतमांशुक गन्ध माल्यशोभे।

भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवन भूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥१८॥

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखाव सृष्टस्वर्वाहिनी विमलचारु जलप्लुताङ्गीम्।

प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणीं अमृताब्धि पुत्रीम्॥१९॥

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूर तरंगि तैरपाङ्गैः।

अवलोकय माम् अकिञ्चनानां प्रथमं पात्रं अकृत्रिमं दयायाः॥२०॥

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।

गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते भुवि बुध भाविताशयाः॥२१॥

॥ श्रीभगवत्पादशङ्कराचार्यविरचितं श्रीकनकधारा स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

         इसके बाद दूसरे दिन से नित्य २१ दिनों तक एक माला मन्त्र जाप एवं एक पाठ कनकधारा स्तोत्र का करते रहें। फिर आप इसका चमत्कार देखें।

          इस यन्त्र की एक विशेषता होती है कि इस यन्त्र पर जितने अधिक लोगों की दृष्टि पड़ती हैयह उतना ही अधिक प्रभावी फल देता है।

          आपके लिए यह दीपावली महापर्व मंगलमय हो और यह दीपावली आप के जीवन में धन-धान्यसुख-समृद्धियश एवं अपार खुशियाँ लेकर आए। मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए ऐसी ही कामना करता हूँ।

          इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश ॥