सोमवार, 11 सितंबर 2017

नवरात्रि और लघु साधना प्रयोग

नवरात्रि और लघु साधना प्रयोग


          शारदीय नवरात्रि पर्व निकट ही है। यह नवरात्रि पर्व २१ सितम्बर २०१७ से आरम्भ हो रहा है और इसका समापन २१ सितम्बर २०१७ को हो रहा है। ३० सितम्बर २०१७ को विजय दशमी अर्थात् दशहरा पर्व आ रहा है। आप सभी को शारदीय नवरात्रि पर्व एवं दशहरा पर्व की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          हिन्दू धर्म के अन्तर्गत दुर्गापूजा के रूप में नवरात्रि पर्व साल में दो बार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। नवरात्रि के दिनों में नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों में भक्तगण दुर्गा माँ के नौ रूपों की पूजा पूरी श्रद्धा से करते हैं। नवरात्रों के इन पर्वों को देशभर में पूरे उत्‍साह के साथ मनाया जाता है।

          देश के कुछ हिस्‍सों में महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती, महाकाली और दुर्गा के नौ स्वरुपों की अलग-अलग अन्दाज में पूजा की जाती है। दुर्गा माता के इन उत्‍सवों को विशेष तौर पर रात में मनाने की परम्परा है। ऋषि-मुनियों ने नवरात्र को दो भागों में विभाजित किया है। पहला, विक्रम संवत के पहले दिन यानी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से नवमी तिथि तक वासन्तीय नवरात्र और दूसरा, छः महीने बाद आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि से नवमी तिथि तक शारदीय नवरात्र। आश्विन मास में मनाए जाने वाले नवरात्रों में दसवें दिन विजयदशमी यानी दशहरा त्‍यौहार के रूप में मनाया जाता है।

          आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पहली तिथि से मनाए जाने वाले पर्व नवरात्र में दुर्गा के नौ स्‍वरूपों की पूजा बेहद धूमधाम से होती है। शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। ऐसा माना जाता है कि भगवान राम ने सबसे पहले समुद्र के किनारे शारदीय नवरात्रों की पूजा की शुरूआत की थी। लगातार नौ दिन की पूजा के बाद भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्‍त करने के उद्देश्‍य से पूजा समाप्‍त कर आगे प्रस्‍थान किया था और भगवान राम को लंका पर विजय प्राप्ति भी हुई थी।

          इसी कारण शारदीय नवरात्रों में नौ दिनों तक दुर्गा माँ की पूजा के बाद दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है। हर साल दसवें दिन तब से ही दशहरा मनाया जाता है और माना जाता है कि धर्म की अधर्म पर जीत, सत्‍य की असत्‍य पर जीत के लिए दसवें दिन दशहरा मनाते हैं।

          नवरात्रि पर्व के इस पावन अवसर पर साधक भाई-बहन तो साधना सम्पन्न करते ही हैं, परन्तु कई गुरुभाई-बहन ऐसे भी हैं, जो अपनी व्यस्तता के कारण साधना नहीं कर पाते हैं अथवा जिनके पास समय ही नहीं है अथवा अन्य कोई कारण हो, जिससे वे साधना करने में असमर्थ हैं, उनके लिए प्रस्तुत है लघु साधना प्रयोग।

          ये प्रयोग दिखने में साधारण है, परन्तु पूर्ण प्रभावशाली है, सिर्फ इनमें आपका विश्वास अटूट होना चाहिये। क्यूँकि ये सभी प्रयोग माँ जगदम्बा के हैं, जो इस संसार की जगत-जननी है।

          (१) नवरात्रि के प्रथम दिन साधक अपनी तीन मनोकामनाएँ बोलकर एक लाल वस्त्र में तीन लौंग बाँध दें और माँ भगवती जगदम्बा के चरणों मे समर्पित कर दें। फिर निम्न मन्त्र का १०-१५ मिनिट तक जाप करें -----

         ।। ॐ ह्रीं कामना सिद्ध्यर्थे स्वाहा ।।

OM HREEM KAAMANA SIDDHYARTHE SWAAHAA.

          दूसरे दिन सुबह पवित्र होकर लाल वस्त्र में देखे कि कितनी लौंग बची हुई है? अगर सारी लौंग गायब हो जाए तो समझ लीजिए कि आपकी तीनों कामनाएँ पूर्ण होगी। इस क्रिया का समय है शाम ०४:३० से रात्रि ०९:०० बजे तक।

          (२) नवरात्रि के द्वितीय दिवस साधक एक स्टील की प्लेट में कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं और उस प्लेट में अनार का शुद्ध रस भर दें। वह प्लेट माँ भगवती दुर्गा के चरणों में अर्पित कर दें और साथ में आरोग्य प्राप्ति की कामना करें। आप चाहे तो किसी दूसरे व्यक्ति विशेष के लिए भी कर सकते हैं।

     इस प्रयोग में अनार के रस को देखते हुए निम्न मन्त्र का ३० मिनिट तक जाप करना है -----

          ।। ॐ ह्रीं आरोग्यवर्धिनी ह्रीं ॐ नम: ।।

OM HREEM AAROGYAVARDHINI HREEM OM NAMAH.

          दूसरे दिन आप स्नान करें और फिर अनार के रस से स्नान करें। तत्पश्चात जल से फिर एक बार शुद्धोदक स्नान करें।

          किसी और के लिए कर रहे हों तो उसको स्नान करवाएं। यह सब सम्भव ना हो तो अनार के रस को पीपल के वृक्ष की जड़ में चढ़ा दीजिए। इस प्रयोग का समय होगा रात्रि को ९:०० से १०:३० बजे तक।

           (३) नवरात्रि के तृतीय दिवस साधक ७ काली मिर्च के दाने लें। उसे सिर से लेकर पैरों तक ७ बार उतारें और काले वस्त्र में बाँधकर माँ भगवती के चरणों में समर्पित कर दें। फिर निम्न मन्त्र का ३६ मिनिट तक जाप करें -----

          ।। ॐ क्रीं सर्व दोष निवारण कुरु कुरु क्रीं फट् ।।

OM KREEM SARVA DOSH NIVAARANN KURU KURU KREEM PHAT.

          इस प्रयोग से तन्त्र बाधा समाप्त होती है। प्रयोग के बाद दूसरे दिन सुबह काले वस्त्र की पोटली को जल में प्रवाहित कर दें। साधना का समय रात्रि में ०९ बजे से ०१:३० तक रहेगा।

           (४) नवरात्रि के चौथे दिन साधक लाल वस्त्र में कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं और स्वस्तिक पर ९ कमलगट्टे स्थापित करें, उनका पूजन करें। तदुपरान्त निम्न मन्त्र का २७ मिनिट तक जाप करें -----

                 ।। ॐ श्रीं प्रसीद प्रसीद श्रीं श्रियै नमः ।।

OM SHREEM PRASEED PRASEED SHREEM SHRIYEI NAMAH.

          इस साधना के लिए समय होगा शाम ६.०० से रात्रि १०.३० बजे तक।

          साधना से पूर्व एवं दूसरे दिन माँ भगवती दुर्गा से प्रार्थना करे कि मेरा जीवन आपकी कृपा से धन-धान्य-सुख-सौभाग्य युक्त हो और दूसरे दिन वस्त्र सहित कमलगट्टे जल में प्रवाहित कर दें।

          (५) नवरात्रि के पाँचवें दिन साधक पाँच हरी इलायची माँ भगवती जगदम्बा के चरणों में समर्पित करें और व्यवसाय वृद्धि की कामना करें। फिर साधक श्रीसूक्त का ५ बार पाठ करें -----

।। श्री सूक्त ।।

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१।।
ताम्म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरूषानहम्।।२।।
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्।।३।।
कां सोऽस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।४।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।।५।।
आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६।।
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे।।७।।
क्षुत्पिपासाऽमलां ज्येष्ठां अलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिं असमृद्धिं च सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।८।।
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्।।९।।
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः।।१०।।
कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्।।११।।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले।।१२।।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगला पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१३।।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१४।।
ताम्म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्।।१५।।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पंचदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्।।१६।।

          दूसरे दिन इलायची को किसी डिबिया में सँभाल कर रख दें। शीघ्र ही व्यवसाय में वृद्धि एवं लाभ की प्राप्ति होती है। साधना समय रहेगा दोपहर १.३० से शाम ७:३० बजे तक।

          (६) नवरात्रि के छठें दिन साधक पाँच केले माँ भगवती जगदम्बा के चरणों में समर्पित करें और माँ से गुरुकृपा प्राप्ति की कामना करें। फिर साधक निम्न मन्त्र का ४५ मिनिट तक जाप करें -----

          ।। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्रीं शक्ति सिद्धये नमः ।।

OM AYIEM HREEM SHREEM SHREEM SHAKTI SIDDHAYE NAMAH.

          साधना का समय रात्रि १०:३० से ३:०० बजे तक रहेगा। दूसरे दिन केले छोटे बालकों में बाँट दें।

          (७) नवरात्रि सातवें दिन साधक १०८ हरी चूड़ियाँ माँ भगवती जगदम्बा के चरणों में समर्पित करें और माँ से बल, बुद्धि, विद्या एवं सुख प्राप्ति की कामना करें। फिर साधक निम्न मन्त्र का ३२४ बार उच्चारण करें -----

    ।। ॐ नमो भगवती जगदम्बा सर्वकामना सिद्धि कुरु कुरु ॐ फट् ।।

OM NAMO BHAGVATI JAGDAMBA SARVKAAMNA SIDDHI KURU KURU OM PHAT.
      
    दूसरे दिन १२-१२ चूड़ियाँ ९ कन्याओं में बाँट दें। इस साधना का समय होगा रात्रि ७:३० बजे से १२.०० बजे तक।

          (८) नवरात्रि के आठवें दिन साधक सुबह ६:०० से ७.४८ के शुभ समय पर १०९ लौंग की माला बनाएं, जिसमें १ लौंग सुमेरु होगा फिर इसी माला से साधक निम्न विशेष अंक मन्त्र का १ माला जाप करें -----

                 ।। ॐ ७ ४ १ ५ २ ३ ६ ॐ दुं दुर्गायै नमः।।

OM SAAT CHAAR EK PAANCH DO TEEN CHHEH OM DUM DURGAAYEI NAMAH.

          इस मन्त्र का उच्चारण होगा --- ॐ सात चार एक पाँच दो तीन छ: ॐ दुं दुर्गायै नमः।

          मन्त्र जाप के बाद माला को किसी दुर्गा जी के मन्दिर जाकर शेर के गले में पहना दें और अपनी विशेष कामना शेर के कान में बोल दें या फिर आप माला को जहाँ कहीं दुर्गाजी के विग्रह की स्थापना हूई हो, वहाँ भी यह कार्य कर सकते हैं। माला पहनाने का समय होगा सुबह १०:३० से दोपहर ३:०० बजे तक।

          (९) नवरात्रि की नवमी तिथि को ९ कुँवारी कन्या का पूजन करें और उन्हें उपहार स्वरूप काजल की डिब्बिया अवश्य दें तथा ज्यादा से ज्यादा निम्न त्रिशक्ति मन्त्र का जाप करें -----

        ।। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ॐ नमः।।

OM AYIEM HREEM SHREEM OM NAMAH.

          कुँवारी कन्या पूजन का समय होगा, सुबह ६:०० से रात्रि १०:३० बजे तक।

          (१०) दशहरा (विजया दशमी) दिवस विजय प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ दिवस है। ज्यादा से ज्यादा गुरुमन्त्र का जाप करें एवं निम्न मन्त्र का जाप करें -----

     ।। ॐ रां रामाय नमः।।

OM RAAM RAAMAAY NAMAH.

          अवश्य ही आपको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण विजय प्राप्ति होगी। साधना का समय दोपहर १२:०० से शाम ४:३० बजे तक रहेगा।

         नवरात्रि पर्व एवं दशहरा पर्व आपके लिए मंगलमय हो। माँ भगवती आप पर कृपालु हों और उनका वरदहस्त आपको प्राप्त हो। मैं सद्गुरुदेव भगवान श्रीनिखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

       इसी कामना के साथ


ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश।

सोमवार, 28 अगस्त 2017

पितृ शान्ति साधना

पितृ शान्ति साधना


      हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक का समय श्राद्ध पक्ष कहलाता है। इस वर्ष श्राद्ध पक्ष का प्रारम्भ ६ सितम्बर २०१७ (पूर्णिमामंगलवार) से हो रहा हैजिसका समापन २० सितम्बर (अमावस्याबुधवार) को होगा। हिन्दू धर्म के अनुसार  इस दौरान पितरों की आत्मा की शान्ति के लिए तर्पणश्राद्धपिण्डदान आदि किया जाता है।

           
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिन लोगों की कुण्डली में कालसर्प दोष अथवा पितृदोष होवे अगर श्राद्ध पक्ष में इस दोष के निवारण के लिए उपाय‚ पूजन व साधना करें तो शुभ फलों की प्राप्ति होती है तथा कालसर्प दोष अथवा  पितृदोष  के दुष्प्रभाव में कमी आती है।

            विश्व के लगभग सभी धर्मों में यह माना गया है कि मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति की देह का तो नाश हो जाता हैलेकिन उनकी आत्मा कभी भी नहीं मरती है। पवित्र गीता के अनुसार जिस प्रकार स्नान के पश्चात् हम नवीन वस्त्र धारण करते हैंउसी प्रकार यह आत्मा भी मृत्यु के बाद एक देह को छोड़कर नवीन देह धारण करती है।


            हमारे पित्तरों को भी सामान्य मनुष्यों की तरह सुखदुखमोहममताभूखप्यास आदि का अनुभव होता है। यदि पितृ योनि में गये व्यक्ति के लिये उसके परिवार के लोग श्राद्ध कर्म तथा श्रद्धा का भाव नहीं रखते हैं तो वह पित्तर अपने प्रियजनों से नाराज हो जाते हैं। सामान्यतः इन पित्तरों के पास आलौकिक शक्तियाँ होती है तथा यह अपने परिजनों एवं वंशजों की सफलता व सुख-समृद्धि के लिये चिन्तित रहते हैंजब इनके प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक कर्म नहीं किये जाते हैं तो यह निर्बलता का अनुभव करते हैं तथा चाहकर भी अपने परिवार की सहायता नहीं कर पाते हैं तथा यदि यह नाराज हो गये तो इनके परिजनों को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।


            पितृदोष होने पर व्यक्ति को जीवन में तमाम तरह की परेशानियाँ उठानी पड़ती हैजैसे घर में सदस्यों का बीमार रहनामानसिक परेशानीसन्तान का ना होनाकन्या का अधिक होना या पुत्र का ना होनापारिवारिक सदस्यों में वैचारिक मतभेद होनाजीविकोपार्जन में अस्थिरता या पर्याप्त आमदनी होने पर भी धन का ना रूकनाप्रत्येक कार्य में अचानक रूकावटें आनासिर पर कर्ज़ का भार होनासफलता के करीब पहुँचकर भी असफल हो जानाप्रयास करने पर भी मनवांछित फल का ना मिलनाआकस्मिक दुर्घटना की आशंका तथा वृद्धावस्था में बहुत दुख प्राप्त होना आदि।


          बहुत से लोगों की कुण्डली में कालसर्प योग भी देखा जाता है। वस्तुतः कालसर्प योग भी पितृ दोष के कारण ही होता हैजिसकी वजह से मनुष्य को जीवन में तमाम मुसीबतों एवं अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।


            पितृ दोष से सम्बन्धित ज्योतिषीय विवेचन पूर्व में प्रस्तुत किया जा चुका है। अब प्रस्तुत है पितृ दोष निवारणार्थ सरल साधना विधि ----

पितृ शान्ति साधना

             यह साधना किसी भी पूर्णिमा अथवा अमावस्या को सम्पन्न करे या शनिवार को भी की जा सकती है।

             समय शाम का होगा, सूर्यास्त के समय करे।

             दिशा पूर्व हो, पीले वस्त्र धारण करे, आसन पीला हो। सामने बाजोट पर पीला कपड़ा बिछाए और उस पर गुरु चित्र स्थापित कर सामान्य पूजन करेंइसके बाद गुरुमन्त्र का कम से कम चार माला जाप करें और उनसे पितृ शान्ति साधना सम्पन्न करने की आज्ञा लें। फिर सद्गुरुदेवजी से साधना की निर्बाध पूर्णता एवं सफलता के लिए प्रार्थना करें।

             इसके बाद वहीं सामने एक शक्कर की ढेरी बनाएं, एक सफ़ेद तिल की ढेरी बनाएं और एक कटोरी में थोड़ा घी भी रखें। एक नारियल का गोला भी रखें

             इसके बाद साधक को साधना के पहिले दिन संकल्प अवश्य लेना चाहिए। प्रतिदिन संकल्प लेने की आवश्यकता नहीं है।

             संकल्प लेने के बाद सबसे पहिले गायत्री मन्त्र का तीन माला (३२४ बार) जाप करें –––––

मन्त्र :-----

      ।। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।

OM BHOORBHUVAH SWAH TATSAVITURVARENNYAM BHARGO DEVASYA DHEEMAHI DHIYO YO NAH PRACHODADAAT.

             इसके बाद सवा घण्टे तक बिना माला के निम्न मन्त्र का जाप करें --

                 ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।

             OM NAMO BHAGWATE VAASUDEVAAY.

             अन्त में पितृ स्तोत्र के ग्यारह पाठ सम्पन्न करें --–––

पुराणोक्त पितृ स्तोत्र :----------

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।१।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान्नमस्यामि कामदान्।।२।।
मन्वादिनां च नेतारः सूर्याचन्दमसोस्तथा।
तान्नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्यूदधावपि।।३।।
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः।।४।।
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृतांजलिः।।५।।
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।।६।।
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।७।।
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।८।।
अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।९।।
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।१०।।
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।११।।

             मन्त्र जाप के बाद सारे जाप एक आचमनी जल भूमि पर छोड़कर पितरों को समर्पित कर दे। अब नारियल के गोले को ऊपर से थोड़ा-सा काटकर उसमें बाजोट पर स्थापित तिल,शक्कर और घी भर दे तथा गोले को फिर से बन्द कर दे। ऊपर नारियल के गोले का जो टुकड़ा काटा था, उसी को  लगाकर पुनः बन्द करे और आस पास गीला आटा लगा दे, ताकि गोला खुले नहीं। इस गोले को जाकर किसी पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ दे और बिना पीछे मुड़े घर आ जाए। इस साधना से सभी पितृ तृप्त होते हैं और साधक को आशीर्वाद देते हैं।

              यह साधना एक दिवसीय है, लेकिन आप चाहे तो पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष में , , या ११ दिन तक सम्पन्न कर सकते हैं। अधिक दिन तक करने की स्थिति में बाजोट पर स्थापित शक्कर, तिल, घी, नारियल गोला को सुरक्षित रखने की व्यवस्था पहले से ही कर ले, क्योंकि चूहा आदि जन्तु क्षति पहुँचा सकते हैं। मन्त्र जाप के पश्चात वाली सारी प्रक्रिया अन्तिम दिन कर ले।

             समस्त पितृ आप व आपके परिवार पर प्रसन्न होकर शुभ आशीर्वाद प्रदान करे।  मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

               इसी कामना के साथ


ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश।

शनिवार, 26 अगस्त 2017

ज्योतिषीय योग पितृदोष और निवारण के सरल उपाय

ज्योतिषीय योग पितृदोष और निवारण के सरल उपाय



          हिन्दू धर्म में ज्योतिष को वेदों का छठा अंग माना गया है और किसी व्यक्ति की जन्म-कुण्डली देखकर आसानी से इस बात का पता लगाया जा सकता है कि वह व्यक्ति पितृ दोष से पीड़ित है या नहीं। क्योंकि यदि व्यक्ति के पितर असन्तुष्ट होते हैं, तो वे अपने वंशजों की जन्म-कुण्डली में पितृ दोष से सम्बन्धित ग्रह-स्थितियों का सृजन करते हैं।

          भारतीय ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार जन्म-पत्री में यदि सूर्य-शनि या सूर्य-राहु का दृष्टि या युति सम्बन्ध हो और यह सम्बन्ध जन्म-कुण्डली के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम व दशम भावों में से किसी एक भाव में हो तो इस प्रकार की जन्म-कुण्डली वाले जातक को पितृ दोष होता है। साथ ही कुण्डली के जिस भाव में यह योग होता है, उससे सम्बन्धित अशुभ फल ही प्राथमिकता के साथ घटित होते हैं।

          उदाहरण के लिए यदि सूर्य-राहु अथवा सूर्य-शनि का अशुभ योग प्रथम भाव में हो तो वह व्यक्ति अशान्त प्रकृति का होता है और उसे गुप्त चिन्ता, दाम्पत्य एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियाँ होती हैं, क्योंकि प्रथम भाव को ज्योतिष में लग्न कहते हैं और यह शरीर का प्रतिनिधित्व करता है।

          दूसरे भाव से धन, परिवार आदि के बारे में पता चलता है। इस भाव में यह योग बने तो धन व परिवार से सम्बन्धित परेशानियाँ जैसे कि पारिवारिक कलह, वैमनस्य व आर्थिक उलझनें होती हैं।

          चतुर्थ भाव से माता, वाहन, सम्पत्ति आदि के बारे में पता लगता है। इस भाव में यह योग हो तो भूमि, मकान, माता-पिता एवं गृह-सुख में कमी या कष्ट होते हैं।

          पंचम भाव में यह योग हो तो उच्च विद्या में विघ्न व सन्तान सुख में कमी होने के संकेत होते हैं।
        
          सप्तम भाव में यह योग हो तो यह योग वैवाहिक सुख व साझेदारी के व्यवसाय में कमी या परेशानी का कारण बनता है। 
     
          नवम भाव या नवम भाव का स्वामी यदि किसी भी तरह से राहु या केतु से ग्रसित है तो यह निश्चित रूप से पितृदोष होता है और भाग्योन्नति में बाधाएँ उत्पन्न करता है।

          पिता के स्थान दशम भाव का स्वामी ६, ८ या १२ वें भाव में चला जाए एवं गुरु पापी ग्रह प्रभावित या राशि में हो, साथ ही लग्न तथा पंचम भाव का स्वामी पाप ग्रहों से युति करे तो ऐसी कुण्डली पितृशाप दोष युक्त कहलाती है। ऐसी कुण्डली युक्त जातक को सर्विस या कार्य, सरकार व व्यवसाय सम्बन्धी परेशानियाँ होती हैं।

          प्रत्येक भावानुसार फल का विचार होता है। सूर्य यदि नीच में होकर राहु या शनि के साथ पड़ा हो तो पितृदोष ज्यादा होता है।

          किसी कुण्डली में लग्नेश ग्रह यदि कोण (६, ८ या १२ वें भाव) में स्थित हो तथा राहु लग्न भाव में हो तब भी पितृदोष होता है।

          पितृयोग कारक ग्रह पर यदि त्रिक (६, , १२) भावेश एवं भावों के स्वामी की दृष्टि अथवा युति का सम्बन्ध भी हो जाए तो अचानक वाहनादि के कारण दुर्घटना का भय, प्रेतबाधा, ज्वर, नेत्ररोग, तरक्की में रुकावट या बनते कार्यों में विघ्न, अपयश, धनहानि आदि अनिष्ट फल होते हैं। ऐसी स्थिति में रविवार की संक्रान्ति को लाल वस्तुओं का दान करने तथा पितरों का तर्पण करने से पितृ आदि दोषों की शान्ति होती है।

          चन्द्र-राहु, चन्द्र-केतु, चन्द्र-बुध, चन्द्र-शनि आदि योग भी पितृ दोष की भाँति मातृ दोष कहलाते हैं। इनमें चन्द्र-राहु एवं सूर्य-राहु योगों को ग्रहण योग तथा बुध-राहु को जड़त्व योग कहते हैं।

         इन योगों के प्रभावस्वरूप भी भावेश की स्थिति अनुसार ही अशुभ फल प्रकट होते हैं। सामान्यतः चन्द्र-राहु आदि योगों के प्रभाव से माता अथवा पत्नी को कष्ट, मानसिक तनाव, आर्थिक परेशानियाँ, गुप्त रोग, भाई-बन्धुओं से विरोध, अपने भी परायों जैसे व्यवहार रखें आदि फल घटित होते हैं।

          यदि आठवें या बारहवें भाव में गुरु-राहु का योग और पंचम भाव में सूर्य-शनि या मंगल आदि कू्र ग्रहों की स्थिति हो तो पितृदोष के कारण सन्तान कष्ट या सन्तान सुख में कमी रहती है।

          अष्टमेश पंचम भाव में तथा दशमेष अष्टम भाव में हो तो भी पितृदोष के कारण धन हानि अथवा सन्तान के कारण कष्ट होते हैं।

          यदि पंचमेश सन्तान कारक ग्रह राहु के साथ त्रिक भावों में हो तथा पंचम में शनि आदि कू्र ग्रह हो तो भी सन्तान सुख में कमी होती है।

          इसी प्रकार राहु अथवा शनि के साथ मिलकर अनेक अनिष्टकारी योग बनते हैं, जो पितृदोष की भाँति ही अशुभ फल प्रदान करते हैं।

          बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में कुण्डली में इस प्रकार के शापित योग कहे गए हैं। इनमें पितृदोष श्राप, भ्रातृ श्राप,मातृ श्राप, प्रेम श्राप आदि योग प्रमुख हैं।

          अशुभ पितृदोषों योगों के प्रभाव स्वरूप जातक के स्वास्थ्य की हानि, सुख में कमी, आर्थिक संकट, आय में बरकत न होना, सन्तान कष्ट अथवा वंशवृद्धि में बाधा, विवाह में विलम्ब, गुप्त रोग, लाभ व उन्नति में बाधाएँ, तनाव आदि अशुभ फल प्रकट होते हैं।

          यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में सूर्य-राहू, सूर्य-शनि आदि योगों के कारण पितृदोष हो तो उसके लिए नारायण बलि, नाग पूजा, अपने दिवंगत पितरों का श्राद्ध, पितृ तर्पण, ब्रह्म भोज, दानादि कर्म करवाने चाहिए। पितृदोष निवारण के लिए अपने घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने दिवंगत पूर्वजों के फोटो लगाकर उन पर हार चढ़ाकर सम्मानित करना चाहिए तथा उनकी मृत्यु तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र एवं दक्षिणा सहित दान, पितृ तर्पण एवं श्राद्ध कर्म करने चाहिए।

हाथ में पितृदोष के लक्षण :––––––––––

          हाथ में पितृदोष को आसानी से नहीं खोजा जा सकता, बहुत से लक्षण देखने के बाद ही किसी आप किसी निष्कर्ष पर पहुँच  सकते हैं। फिर भी कुछ साधारण लक्षण हम आपको बताते हैं -----

१. सूर्य रेखा का टूटा हुआ होना

          हाथ में सूर्य पर्वत का बहुत कमज़ोर होना या सूर्य पर्वत पर रेखाओं का जाल होना पितृदोष को दर्शाता है। सूर्य की स्थिति हाथ में बहुत महत्वपूर्ण है। अकेले सूर्य के कमज़ोर होने से व्यक्ति के जीवन में बहुत बड़ा स्थान रिक्त रह जाता है। प्रसिद्धि, तरक्की, जीवन में भोग विलास के लिए जो पैसा चाहिए, जो सम्मान चाहिए, वह बिना सूर्य के नहीं मिल पाता।

२. हाथ में जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा, हृदय रेखा का मिलन

          अगर आपके हाथ में जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा, हृदय रेखा एक जगह पर मिल रही है तो यह भी पितृदोष की निशानी है। इस स्थिति में व्यक्ति आत्महत्या के लिए प्रेरित होता है। उसके विचार निराशावादी हो जाते हैं और जीवन में प्रगति बाधित होती है।

पितृदोष निवारण के सरल उपाय :----------



          वैसे तो कुण्डली में किस प्रकार का पितृदोष है, उस पितृदोष के प्रकार के हिसाब से ही पितृदोष शान्ति करवाना अच्छा होता है। लेकिन कुछ ऐसे सरल सामान्य उपाय भी हैं, जिनको करने से पितृदोष शान्त हो जाता है, ये उपाय निम्नलिखित हैं -----

          १. ब्रह्म पुराण (२२०/१४३ ) में पितृगायत्री मन्त्र दिया गया है, इस मन्त्र की प्रतिदिन १ माला या अधिक जाप करने से पितृदोष में अवश्य लाभ होता है।

मन्त्र :-----

।। ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः।।

          २. मार्कण्डेय पुराण (९४/३ -१३ ) में वर्णित इस चमत्कारी पितृ स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भी पितृ प्रसन्न होकर स्तुतिकर्ता की मनोकामना की पूर्ति करते हैं -----

पुराणोक्त पितृ स्तोत्र :----------

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।१।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान्नमस्यामि कामदान्।।२।।
मन्वादिनां च नेतारः सूर्याचन्दमसोस्तथा।
तान्नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्यूदधावपि।।३।।
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः।।४।।
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृतांजलिः।।५।।
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।।६।।
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।७।।
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।८।।
अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।९।।
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।१०।।
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।११।।

विशेष :---

                   मार्कण्डेयपुराण में महात्मा रूचि द्वारा की गयी पितरों की यह स्तुति पितृस्तोत्र कहलाता है। पितरों की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है। इस स्तोत्र की बड़ी महिमा है। श्राद्ध आदि के अवसरों पर ब्राह्मणों के भोजन के समय भी इसका पाठ करने-कराने का विधान है।

           ३. भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न  मन्त्र  की एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृदोष, संकट, बाधा आदि शान्त होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है। मन्त्र जाप प्रातः या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं।

मन्त्र :-----

।। ॐ तत्पुरुषाय विद्महे  महादेवाय च धीमहि तन्नो  रुद्रः प्रचोदयात् ।।

          ४. अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा, घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृदोष शान्त होता है।

           ५. अपने माता-पिता, बुजुर्गों का सम्मान, भाई-बहिनों, सभी स्त्री कुल का आदर/सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं।

           ६. पितृदोष जनित सन्तान कष्ट को दूर करने के लिए हरिवंश पुराण का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें।

           ७. प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है।

           ८. सूर्य पिता है, अतः ताँबे के लोटे में जल भर कर, उसमें लाल फूल, लाल चन्दन का चूरा, रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर ११ बार ॐ घृणि सूर्याय नमः मन्त्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है।

          ९. अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध, चीनी, सफ़ेद कपडा, दक्षिणा आदि किसी मन्दिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए।

          १०. पितृपक्ष में पीपल की परिक्रमा  अवश्य करें। अगर प्रतिदिन यदि कोई व्यक्ति पीपल के पेड़ पर मीठा जल, मिष्ठान्न एवं जनेऊ अर्पित करते हुए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः मन्त्र का जाप करते हुए कम से कम सात या १०८ परिक्रमा करें। तत्पश्चात् अपने अपराधों एवं त्रुटियों के लिये क्षमा माँगे तो पितृ दोष से उत्पन्न समस्त समस्याओं का निवारण हो जाता है।

           ११. हर अमावस को अपने पितरों का ध्यान करते हुए पीपल पर कच्ची लस्सी, गंगाजल, थोड़े काले तिल, चीनी, चावल, जल, पुष्पादि चढ़ाते हुए "ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः" मन्त्र तथा पितृ सूक्त का पाठ करना शुभ होगा।

          मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

          इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश।।