शनिवार, 13 अप्रैल 2019

हनुमान प्रत्यक्ष सिद्धि प्रयोग


हनुमान प्रत्यक्ष सिद्धि प्रयोग


          श्रीहनुमान जयन्ती निकट ही है। इस बार यह १९ अप्रैल २०१९ को आ रही है। आप सभी को श्रीहनुमान जयन्ती की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          हनुमान शक्तिशाली, पराक्रमी, संकटों का नाश करने वाले और दुःखों को दूर करने वाले महावीर हैं। इनके नाम का स्मरण ही साहस और शक्ति प्रदान करने वाला है।  एक कहावत है कि "घर का जोगी जोगिया और आन गाँव का सिद्ध" यह बात पवनपुत्र रुद्रावतार श्रीहनुमान के सम्बन्ध में लागू होती है। श्रीहनुमान साधना द्वारा कष्टों का निवारण जिस सरल और सहज भाव से हो सकता है, उतनी सरल कोई अन्य साधना नहीं है। फिर क्लिष्ट साधनाएँ क्यों की जाए, हनुमान साधनाएँ तो रामबाण साधनाएँ हैं।

          कई वर्ष पुरानी बात है। मेरे एक मित्र का नौकरी के लिए इण्टरव्यू था, मित्र बड़े परेशान और वास्तव में भयभीत थे, नौकरी की बहुत सख्त आवश्यकता थी। इण्टरव्यू के लिए बुलावा दो सौ से अधिक लोगों का था और चयन केवल पाँच का ही होना था। चिन्ता और अनिश्चय से मित्र बड़े व्याकुल थे, मैंने कहा कि इण्टरव्यू में भीतर जाने से पहले शान्त मन से केवल एक बार "हनुमान मन्त्र चमत्कारानुष्ठान" का पाठ अवश्य कर लेना। तब परीक्षार्थी तो पुस्तक टटोल रहे थे, परन्तु मेरे मित्र एक कुर्सी पर बैठकर "हनुमान मन्त्र चमत्कारानुष्ठान" का पाठ कर रहे थे। पाठ करने के बाद उनका नम्बर आया और वह सहज भाव से पूरे आत्मविश्वास के साथ भीतर गए, बिना किसी सिफारिश के उनका सेलेक्शन हो गया। यह श्रीहनुमान चमत्कार ही है।

          यह सिद्ध बात है कि कृष्णपक्ष में अर्धरात्रि के पश्चात शहर के किसी घने जंगल अथवा श्मशान में भी हनुमान मन्त्र, हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए हनुमान साधक निकल जाएं तो सर्प, बिच्छू, जंगली जानवर तो क्या, भूत, प्रेत, पिशाच भी पास नहीं फटकते! मरणान्तक पीड़ा से व्याप्त कष्ट भोगते हुए रोगियों को हनुमान साधना से अभिमन्त्रित जल पिलाया है  और हनुमानजी की कृपा से वे पूर्ण स्वस्थ हुए हैं। ऐसा केवल हनुमानजी ही कर सकते हैं, वे अपने भक्तों को कष्ट में नहीं देख सकते। उनके लिए कुछ भी करना सहज सम्भव है, क्योंकि जो एक संजीवनी बूटी के लिए पूरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते हैं, जो रावण जैसे महाप्रतापी का अहंकार चूर-चूर कर सकते हैं, ऐसे एकादश रूद्र की महिमा उनकी भक्ति करके ही जानी जा सकती है।

          श्रीहनुमान प्रतीक है ब्रह्मचर्य, बल, पराक्रम, वीरता, भक्ति, निडरता, सरलता और विश्वास के। शत्रु अथवा बाधा न छोटी होती है और न बड़ी, वह तो केवल व्यक्ति या घटना होती है और उस पर आत्मविश्वास द्वारा विजय प्राप्त की जा सकती है। और जो श्रीहनुमान का साधक है, उसके भीतर तो आत्मविश्वास, आत्मशक्ति छलकती रहती है। उसे ज्ञान है कि मेरी पीठ के पीछे प्रबल पराक्रम के देव बजरंगबली खड़े हैं, फिर मुझे काहे की चिन्ता!

हनुमान उपासना में कुछ आवश्यक तथ्य

     १. हनुमान मूर्ति को तिल में मिले हुए सिन्दूर का लेपन करना चाहिए।

     २. नैवेद्य में प्रातः गुड, नारियल का गोला व लड्डू, मध्याह्न में गुड़, घी और गेहूँ की रोटी का चूरमा अथवा मोटा रोट तथा रात्रि में आम, अमरूद अथवा केला नैवेद्य रूप में चढ़ाना श्रेष्ठ माना गया है।

     ३. पुष्पों में केवल लाल और पीले बड़े फूल जैसे कमल, हजारा, सूर्यमुखी, गेन्दा चढ़ाना चाहिए।

     ४. घी में भीगी हुई एक अथवा पाँच बत्तियों का दीपक जलाना चाहिए।

     ५. हनुमान साधना में ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण रूप से पालन करें।

     ६. सम्भव हो तो कुएं के जल से स्नान करें।

      ७. हनुमान मन्त्र का जप बोलकर अर्थात आवाज के साथ हनुमान मूर्ति/चित्र में नेत्रों को देखते हुए किया जाता है।

     ८. अनिष्ट की इच्छा से हनुमान साधना नहीं करनी चाहिए।

     ९. श्रीहनुमान सेवा, पूजा के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, अतः साधक को सेवा करके फल प्राप्ति की इच्छा रखनी चाहिए, पूजा में पूर्ण श्रद्धा और सेवा भाव होना चाहिए।

     १०. पूजा स्थान में भगवान राम व सीता का चित्र होना हनुमान जी को प्रियकर लगता है।

साधना विधान :-----------

          हनुमान जयन्ती हनुमान साधना का सिद्ध दिवस है। इस दिन संकल्प लेकर आरम्भ किया गया अनुष्ठान/साधना निष्फल नहीं जाती और साधक को अल्पकाल में ही परिणाम दृष्टिगोचर होने लगते हैं। आगे हनुमान प्रत्यक्ष सिद्धि साधना प्रस्तुत की जा रही है, जिसे इस दिन से अथवा किसी भी मंगलवार को आरम्भ किया जा सकता है।

          साधक स्नान आदि से निवृत्त होकर लाल वस्त्र धारण कर दक्षिणाभिमुख होकर वीरासन में बैठ जाएं। अपने सामने एक चौकी पर सिन्दूर छिड़क दें तथा उस पर हनुमानजी का चित्र स्थापित करें। अपने सामने लाल वस्त्र से ढँके बाजोट पर मन्त्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित "हनुमत यन्त्र" को किसी पात्र में स्थापित करें। यन्त्र पर सिन्दूर अच्छी तरह से लगा दें। फिर गुड़, घी, आटे से बनी हुई रोटी को मिलाकर लड्डू बनाकर उसका भोग लगावें।

         फिर दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि मैं अमुक नाम का व्यक्ति अमुक गोत्र अमुक प्रयोजन से यह अनुष्ठान आरम्भ कर रहा हूँ। भगवान हनुमान मेरी साधना को स्वीकार कर मेरा मनोरथ सिद्ध करें। और फिर जल को भूमि पर छोड़ दें।

          इसके बाद श्रीहनुमानजी का सकाम ध्यान करें। दोनों आँखें बन्द कर कुछ देर तक उनके स्वरूप का स्मरण करें तथा उनके आशीर्वाद की कामना करें। हनुमान का ध्यान मन्त्र इस प्रकार है -----

ॐ अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनां अग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
मनोजवं मारुततुल्य वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानर यूथमुख्यं श्री रामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥

          ध्यान के पश्चात फिर निम्न मन्त्र का "मूँगा माला" से २१ माला मन्त्र जाप करें -----

मन्त्र :-----------

॥ ॐ नमो हनुमन्ताय आवेशय आवेशय स्वाहा ॥

OM NAMO HANUMANTAAY AAVESHAY AAVESHAY SWAAHA.

          मन्त्र जाप के बाद एक आचमनी जल छोड़कर समस्त जाप समर्पित कर दें। इसके तुरन्त बाद पूजा स्थान में वहीं भूमि पर ही सो जाएं। यह रात्रिकालीन साधना है। इस प्रकार नित्य ११ दिनों तक करें। जो नैवेद्य हनुमानजी के सामने रखा है, वह आठों प्रहर रखा रहे। अगले दिन रात्रि को वह नैवेद्य दूसरे पात्र में रख दें और नया नैवेद्य हनुमानजी को चढ़ा दें।

          यह निश्चित है कि ११ वें दिन हनुमानजी साधक को प्रत्यक्ष दर्शन देंगे और उसके प्रश्नों का उत्तर देंगे अथवा जिस निमित्त से यह प्रयोग किया गया है, वह कार्य निश्चय ही सम्पन्न होगा।

          जब यह प्रयोग पूरा हो जाए तो वह एकत्र किया हुआ नैवेद्य या तो किसी गरीब व्यक्ति को दे दें अथवा दक्षिण दिशा में घर के बाहर भूमि खोदकर उसे गाड़ दें।

          इसी प्रयोग से साधकों ने कई बड़ी-बड़ी विपत्तियों को सरलता से टाला है, भयंकर रोगों से छुटकारा पाया है, दण्ड पाये व्यक्ति को इस प्रयोग से निदान/छुटकारा मिल सका है, वास्तव में ही यह प्रयोग अपने आप में अचूक और अद्वितीय है।

           आपकी यह साधना सफल हो और भगवान हनुमानजी आपका मनोरथ सिद्ध करें! मैं सद्गुरुदेवजी से यही प्रार्थना करता हूँ।

           इसी कामना के साथ
 
ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश॥।

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

समस्त पाप-दोष, श्राप-दोष एवं कीलन-दोष समापन प्रयोग


समस्त पाप-दोष, श्राप-दोष एवं कीलन-दोष समापन प्रयोग


                  वासन्तीय (चैत्र) नवरात्रि पर्व समीप ही है। यह ६ अप्रैल २०१९ से आरम्भ हो रहा है। इसी दिन से हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत २०७६ भी शुरू हो रहा है। आप सभी को हिन्दू नववर्ष एवं चैत्र नवरात्रि की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          चैत्र नवरात्रि का यह पर्व ज्योतिषीय तथा खगोलीय दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दौरान सूर्य का मेष राषि में प्रवेश होता है। सूर्य का यह राशि परिवर्तन हर राशि पर प्रभाव डालता है तथा इसी दिन से नववर्ष के पंचाग गणना की शुरुआत होती है। चैत्र नवरात्रि के यह नौ दिन इतने शुभ माने जाते हैं कि इन नौ दिनों में आप यदि कोई नया कार्य आरम्भ करना चाहते हैं, तो आपको किसी विशेष तिथि का इन्तजार करने की आवश्यकता नही है। आप पूरी चैत्र नवरात्रि के दौरान कभी भी कोई भी नया कार्य आरम्भ कर सकते हैं।

          इसके साथ ही ऐसी भी मान्यता है कि जो व्यक्ति बिना किसी लोभ के चैत्र नवरात्रि में महादुर्गा की पूजा करता है, वो जन्म-मरण के इस बन्धन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

          माँ आद्या शक्ति की कृपा से मनुष्य में आत्मबल, दृढ़ विश्वास, दया, प्रेम, भक्ति जैसे सद्गुणों का विकास होता है। जीवन के इन्हीं मूल्यों को समझकर मनुष्य जीवन में सच्चा सुख, शान्ति, वैभव, धन, सम्पदा को प्राप्त करता है, अन्यथा इस संसार के दलदल से निकलना उसके लिए सम्भव नहीं है। इसलिए असम्भव को भी सम्भव कर दिखाने की शक्ति मनुष्य को देवी कृपा से ही प्राप्त होती है।

          नवरात्रि में पूजा उपासना का मुख्य उद्देश्य होता है माँ दुर्गा की आराधना, मनुष्य का तन-मन और इन्द्रियाँ संयमित होना। पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा भाव से किए गए उपवास से मनुष्य का तन सन्तुलित होता है। मनुष्य के तन के संतुलित होने पर योग बल से मनुष्य की इन्द्रियाँ संयमित हो जाती है। इन्द्रियों के संयमित होने पर मनुष्य का मन देवी आराधना में स्थिर हो जाता है, जिसके बल पर मनुष्य को मनोवांछित लाभ की प्राप्ति हो सकती है, इसमें जरा भी संशय नहीं है।

          पुराणों में चैत्र नवरात्रि को विशेष महत्व दिया गया है, इसे आत्म शुद्धि और मुक्ति का आधार माना गया है। चैत्र नवरात्रि में माँ दुर्गा का पूजन करने से नकरात्मक ऊर्जा का खात्मा होता है और हमारे चारों ओर सकरात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

          क्या आपका जीवन किसी के श्राप से दूषित हो गया है या बँध गया है? आपको साधना या अनुष्ठान करने पर भी उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है तो अवश्य ही आप बाधित है। श्राप दोष से मुक्ति केवल माँ भगवती दुर्गा की विशेष साधना से ही सम्भव है। आज मैं एक विशिष्ट प्रयोग दे रहा हूँ, जिसे सम्पन्न कर जीवन में श्राप-दोष एवं पाप-दोष से मुक्ति प्राप्त होती ही है। यह प्रयोग सिर्फ पाप-दोष ही समाप्त नहीं करता, बल्कि श्राप-दोष और कीलन-दोष भी नष्ट कर देता है।

साधना विधान :-----------

          यह प्रयोग किसी भी माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अथवा आने वाली नवरात्रि के प्रथम दिवस से आरम्भ कर नौ दिन तक निरन्तर करें। इस प्रयोग को रात्रि में ही करना चाहिए।

         साधक को चाहिए कि वह स्नान आदि से निवृत्त होकर लाल वस्त्र धारण कर लाल आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुँह कर बैठ जाएं। अपने सामने एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां भगवती दुर्गा का चित्र अथवा विग्रह स्थापित करें। चित्र के पास ही गणेश एवं गुरु को स्थान दें। फिर शुद्ध घी का दीपक एवं धूप प्रज्ज्वलित कर दें।

          सबसे पहले साधक सामान्य गुरु-पूजन एवं गणेश-पूजन करके गुरु-मन्त्र का पाँच माला जाप करें। फिर भगवान गणेश और सद्गुरुदेवजी से साधना में पूर्ण सफलता के लिए प्रार्थना करें।

          अब दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर अपने नाम व गोत्र का उच्चारण कर समस्त पाप-दोष, श्राप-दोष एवं कीलन-दोष से मुक्ति का संकल्प लें और गणेशजी के पास रख दें।
  
          इसके बाद माँ भगवती दुर्गा का सामान्य पूजन कर भोग में मिष्ठान्न व फल अर्पित करें। फिर माँ भगवती से अपने समस्त पाप-दोष, श्राप-दोष एवं कीलन-दोष से मुक्ति के लिए निवेदन करें।

          फिर सर्वप्रथम निम्नलिखित उत्कीलन मन्त्र का १०८ बार जाप करें -----

॥ ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं ॐ ॥

          तत्पश्चात साधक निम्न विनियोग मन्त्र का उच्चारण करते एक आचमनी जल भूमि पर छोड़ दें -----

विनियोग :----------

ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापविमोचनमन्त्रस्य वशिष्ठ-नारदसंवाद-सामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः, सर्वैश्वर्कारिणी श्रीदुर्गादेवता, चरित्रत्रयं बीजं, ह्रीं शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पित कार्यसिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

          अब निम्नलिखित शापोद्धार मन्त्र का २१ बार जाप करें -----

॥ ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिका देव्यै शाप नाशानुग्रहं कुरु-कुरु स्वाहा ॥

          इसके बाद रुद्रयामल महातन्त्र के अन्तर्गत दुर्गाकल्प में कहे गए चण्डिका-शाप-विमोचन अष्टादश शक्ति मन्त्रों का २१-२१ बार जाप करना चाहिए।

अष्टादश शक्ति मन्त्र :----------

॥ ॐ ह्रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिण्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥१॥

॥ ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥२॥

॥ ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिण्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥३॥

॥ ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥४॥

॥ ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥५॥

॥ ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥६॥

॥ ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥७॥

॥ ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥८॥

॥ ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥९॥

॥ ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥१०॥

॥ ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥११॥

॥ ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥१२॥

॥ ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥१३॥

॥ ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥१४॥

॥ ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥१५॥

॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥१६॥

॥ ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥१७॥

॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती स्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः ब्रह्म-वसिष्ठ-विश्वामित्र-शापाद् विमुक्ता भव ॥१८॥

          साधक को प्रत्येक अष्टादश शक्ति मन्त्र का २१-२१ बार जप करना है।

          प्रत्येक अष्टादश शक्ति मन्त्र जप के बाद माँ भगवती दुर्गा के चरणों में एक लाल पुष्प अर्पित करते जाएं। इस प्रकार १८ पुष्प अर्पित करने चाहिए। अष्टादश शक्ति मन्त्रों के जप के पश्चात पुनः २१ बार शापोद्धार मन्त्र का जप करना है।

          इसके बाद पुनः १०८ बार उत्कीलन मन्त्र का जाप करना चाहिए।

          यह शक्ति प्रयोग अत्यन्त तीव्र और प्रभावकारी है। इन अष्टादश शक्तियों का जब आवाहन किया जाता है, तब शरीर और मन से श्राप, पाप एवं कीलन दोष का निराकरण होता ही है। उस समय एक ज्वलन शक्ति-सी उठती है, कुछ विचित्र-से भाव होने लगते हैं। साधक अपने आप को शान्त रखते हुए यह प्रयोग करें।

           अत्यन्त परिश्रम से आप सब के लिए जनकल्याण के उद्देश्य से उपरोक्त मन्त्रों को लिखा है। आशा करता हूँ कि आप सब अवश्य ही इस प्रयोग को करेंगे और लाभान्वित होंगे।

                 आपकी साधना सफल हो और यह नवरात्रि आपके लिए मंगलमय हो! मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

                 इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश ।।


रविवार, 31 मार्च 2019

दुर्गा रहस्य साधना

दुर्गा रहस्य साधना
  

                  वासन्तीय (चैत्र) नवरात्रि पर्व समीप ही है। यह ६ अप्रैल २०१९ से आरम्भ हो रहा है। इसी दिन से हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत २०७६ भी शुरू हो रहा है। आप सभी को हिन्दू नववर्ष एवं चैत्र नवरात्रि की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

          जीवन में कब किस मोड़ पर शत्रु मिल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। यह कोई जरूरी नहीं कि आज जो मित्र है, वह कल भी मित्र ही हो, क्योंकि जो आज तुम्हारा गहरा मित्र है, वही कल स्वार्थ के वशीभूत होकर तुम्हारा घोर शत्रु बन सकता है। यह सब तो समय का कुचक्र ही कहा जा सकता है, जहाँ एक पल में सुख है तो दूसरे ही पल दुःख भी है। जीवन पग-पग परिवर्तनशील है, न जाने कब, कौन-सी विकट परिस्थिति से गुजरना पड़ जाए। शत्रु तो हर मोड़ पर तैनात सैनिकों की तरह खड़े रहते हैं हमला करने के लिए, उस अचानक प्रहार से व्यक्ति संकट में फँस जाता है और उस प्रहार को झेल नहीं पाता, और ऐसी स्थिति में व्यक्ति निर्णय नहीं कर पाता कि अब वह क्या करें और क्या नहीं करें?

          मनुष्य के शत्रु एक नहीं हजारों होते हैं, जब तक वह एक को परास्त करता है, तब तक दूसरा उस पर वार कर देता है और इस सामाजिक संग्राम में युद्ध करते-करते उसकी शक्ति क्षीण होने लगती है, क्योंकि व्यक्ति इस जीवन रूपी संग्राम को अपनी शक्ति के बल पर नहीं जीत सकता। इसके लिए उसके पास दैविक बल होना आवश्यक है, मन्त्रसिद्धि होना आवश्यक है।

          महाभारत काल में श्रीकृष्ण ने गीता में यही कहा है कि हे, अर्जुन तुम युद्ध को शस्त्रों के माध्यम से नहीं जीत सकते। जब तक कि तुम्हारे पीछे दैविक बल नहीं होगा, जब तक कि तुम्हें मन्त्र सिद्धि नहीं होगी, इसलिए तुमने जो द्रोणाचार्य से मन्त्र सिद्धि प्राप्त की है, उस मन्त्र सिद्धि को स्मरण करते हुए गाण्डीव उठाओ, तभी तुम महाभारत युद्ध को जीत सकोगे। केवल धनुष और तीर चलाने से ही यह दुर्योधन, दुःशासन जैसे पापी समाप्त नहीं हो सकते, उसके लिए द्रोणाचार्य ने तुम्हें तीर चलाना ही नहीं सिखाया, अपितु मन्त्र शक्ति भी दी है।

          आए दिन के क्लेश, पति-पत्नी के आपसी झगड़े, रिश्तेदारों, भाई-बन्धुओं में आपसी मतभेद ये सब ईर्ष्या, वैमनस्य, प्रतिस्पर्धा और द्वेष के कारण ही होते हैं। व्यक्ति का जीना दुष्कर हो जाता है, भाई-भाई का दुश्मन हो जाता है, इन आपसी मतभेदों के कारण ही शत्रु व्यक्ति की उन्नति के रास्ते में बाधा उत्पन्न करने लगते हैं, इनसे वह मुक्त नहीं हो पाता। फलस्वरूप वह शारीरिक रूप से तो दुर्बल हो ही जाता है, साथ ही उसकी मानसिक शक्ति भी क्षीण हो जाती है और तब उसे एक ही मार्ग सूझता है, तरह-तरह के पण्डे साधुओं के पास जाकर टोने-टोटके करवाना, तन्त्र प्रयोगों का सहारा लेना और इसमें वह हजारों रुपए भी बर्बाद कर डालता है, किन्तु से कोई लाभ प्राप्त नहीं हो पाता। दर-दर की ठोकरें खाने के बाद वह हताश-निराश होकर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाता है और अपने भाग्य को कोसने लगता है।

          ऐसी स्थिति में साधना ही एकमात्र ऐसा प्रबलतम शस्त्र है, जिसके माध्यम से जीवन के समस्त शत्रुओं को परास्त कर जीवन के महासंग्राम में विजय प्राप्त की जा सकती है और वह भी पूर्णता के साथ। साधना, शक्ति का स्रोत है, जिससे व्यक्ति शारीरिक रूप से तो स्वस्थ और बलवान होता ही है, अपितु मानसिक रूप से भी वह पूर्ण स्वस्थ और बलवान हो जाता है, क्योंकि उसे साधना का बल, ओज और तेजस्विता जो प्राप्त हो जाती है, जो उसे जीवन के हर क्षेत्र में विजयी बनाने में सहायक सिद्ध होती है।

          यदि व्यक्ति के पास साधना का तेज, मन्त्र बल हो तो वह पराजित हो ही नहीं सकता, और यदि उसे उस अद्भुत एवं गोपनीय दुर्गा रहस्य का भली प्रकार से ज्ञान हो तो कोई दूसरी शक्ति ऐसी है ही नहीं, जो उसे परास्त कर सके।

          "दुर्गा रहस्य" से अपने जीवन में आने वाले हर शत्रु को, हर बाधा को, हर अड़चन को हमेशा-हमेशा के लिए दूर किया जा सकता है। फिर किसी टोने-टोटके की या तान्त्रिक प्रयोग की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती, फिर उसे हर प्रकार के डर, भय से छुटकारा मिल जाता है, क्योंकि इस दुर्गा रहस्य को जानने के बाद उसे ऐसा महसूस होने लगता है, मानो कोई शक्ति हर क्षण उसके साथ हो और उसकी सहायता कर रही हो। वह अपने आप को सुरक्षित और निर्भय अनुभव करने लगता है, और उस शक्ति के माध्यम से ही उसमें दृढ़ता और विश्वास का जागरण होता है, जिसके फलस्वरूप उसमें शत्रुओं को परास्त करने की क्षमता स्वतः ही आने लगती है। लेकिन यह तभी सम्भव हो सकता है, जब उसे इस रहस्य का पूर्ण ज्ञान हो और इसके प्रति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास हो।

साधना विधान :-----------

           इसे आप किसी भी नवरात्रि के प्रथम दिवस से आरम्भ कर सकते हैं। यह साधना साधक को रात्रि ९ बजे के बाद ही सम्पन्न करना चाहिए। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठें। लाल  आसन का प्रयोग करें तथा लाल वस्त्र धारण करें। अपने सामने लाल वस्त्र से बाजोट पर "महादुर्गा यन्त्र" अथवा माँ भगवती दुर्गा का सुन्दर चित्र स्थापित करें। समस्त पूजन सामग्री को अपने पास रख लें।

          इस प्रयोग से पूर्व गुरु पूजन एवं पाँच माला गुरुमन्त्र जाप अनिवार्य है, क्योंकि समस्त साधनाओं के एकमात्र सूत्रधार गुरु ही हैं, जो प्रत्येक साधना में सफलता देते हैं।

          इसके पश्चात सामान्य गणपति पूजन और भैरव पूजन अवश्य करें और उनसे साधना की निर्विघ्न पूर्णता एवं सफलता के लिए प्रार्थना करें।

          इसके बाद साधना के प्रथम दिवस साधक को संकल्प अवश्य लेना चाहिए। इसके लिए साधक हाथ में जल लेकर अपने नाम व गोत्र का उच्चारण कर संकल्प ले कि मैं आज से दुर्गा रहस्य साधना का अनुष्ठान आरम्भ कर रहा हूँ। मैं नित्य ९ दिनों तक श्रीदुर्गाआपदुद्धारक स्तोत्र के ११२ पाठ करूँगा। माँ! मेरी साधना को स्वीकार कर मुझे इस स्तोत्र की सिद्धि प्रदान करे और मेरे ज्ञात-अज्ञात समस्त शत्रुओं का शीघ्र संहार हो।

         ऐसा कहकर जल को भूमि पर छोड़ दें।

         इसके बाद यन्त्र अथवा चित्र का कुमकुम, अक्षत व गुलाब की पँखुड़ियों से सामान्य पूजन करें। शुद्ध घी का हलवा बनाकर माँ भगवती दुर्गा को भोग लगाएं। पूरे साधना काल में घी का दीपक जलते रहना चाहिए।          

          फिर दोनों हाथ जोड़कर माँ भगवती दुर्गा का ध्यान करें -----

ॐ कालाभ्रामां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखाम्,
शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीम्,
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥
ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
 शरण्य त्र्यम्बके गौरि नारायणी नमोऽस्तुते॥

          इसके बाद साधक को चाहिए कि वह निम्न मन्त्र का १०८ बार जाप करे -----

॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय-ज्वालय ज्वल-ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥

         अब निम्न स्तोत्र का ११२ बार पाठ करें, जो समस्त शत्रुओं का संहार करके साधक की मनोकामना को पूर्ण करता है -----

॥ श्रीदुर्गाआपदुद्धारक स्तोत्रम् ॥

नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे नमस्ते जगद्व्यापिके विश्वरूपे।
नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥१॥
नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे नमस्ते महायोगिविज्ञानरूपे।
नमस्ते नमस्ते सदानन्द रूपे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥२॥
अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥३॥
अरण्ये रणे दारुणे शुत्रुमध्ये जले सङ्कटे राजगेहे प्रवाते।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तार हेतुर्नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥४॥
अपारे महदुस्तरेऽत्यन्तघोरे विपत् सागरे मज्जतां देहभाजाम्।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥५॥
नमश्चण्डिके चण्डोर्दण्डलीलासमुत्खण्डिता खण्डलाशेषशत्रोः।
त्वमेका गतिर्विघ्नसन्दोहहर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥६॥
त्वमेका सदाराधिता सत्यवादिन्यनेकाखिला क्रोधना क्रोधनिष्ठा।
इडा पिङ्गला त्वं सुषुम्ना च नाडी  नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥७॥
नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे सदासर्वसिद्धिप्रदातृस्वरूपे।
विभूतिः सतां कालरात्रिस्वरूपे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥८॥
शरणमसि सुराणां सिद्धविद्याधराणां मुनिमनुजपशूनां दस्यभिस्त्रासितानाम्।
नृपतिगृहगतानां व्याधिभिः पीडितानां त्वमसि शरणमेका देवि दुर्गे प्रसीद॥९॥

॥ फलश्रुति ॥
इदं स्तोत्रं मया प्रोक्तमापदुद्धारहेतुकम्।
त्रिसन्ध्यमेकसन्ध्यं वा पठनाद्धोरसङ्कटात्॥१०॥
मुच्यते नात्र सन्देहो भुवि स्वर्गे रसातले।
सर्वं वा श्लोकमेकं वा यः पठेद्भक्तिमान् सदा॥११॥
स सर्व दुष्कृतं त्यक्त्वा प्राप्नोति परमं पदम्।
पठनादस्य देवेशि किं न सिद्ध्यति भूतले॥१२॥
स्तवराजमिदं देवि सङ्क्षेपात्कथितं मया॥१३॥

                  ११२ पाठ के उपरान्त पुनः उपरोक्त मन्त्र १०८ जाप करें -----

॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय-ज्वालय ज्वल-ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥

                 मन्त्र जाप के बाद एक आचमनी जल भूमि पर छोड़कर समस्त जाप समर्पित कर दें। इस प्रकार नित्य नौ दिनों तक यह प्रयोग करना चाहिए।

        पहले पाठ में मूल स्तोत्र और फलश्रुति दोनों का पाठ करें। बीच के पाठों में मात्र मूल स्तोत्र का पाठ करें और अन्तिम पाठ में पुनः मूल स्तोत्र एवं फलश्रुति दोनों का पाठ करें। इस प्रकार आप १००८ पाठ को नवरात्रि काल के ९ दिनों में सम्पन्न कर सकते हैं।

        इस प्रयोग को करते समय बार-बार आसन से न उठें, क्योंकि शक्ति की उपासना में विघ्न आने की सम्भावना रहती है।

        यदि किसी कारणवश साधक नवरात्रि काल में इस प्रयोग को सम्पन्न नहीं कर पाए तो किसी भी महीने की पूर्णमासी अथवा रविवार के दिन से इस प्रयोग को शुरू किया जा सकता है।

        प्रयोग समाप्ति के बाद यन्त्र को नदी या कुएं में विसर्जित कर दें तथा चित्र को पूजा स्थान में ही रहने दें।

        यह दुर्गा रहस्य निश्चित ही साधक के सौभाग्य को जागृत करने वाला और शत्रु विनाश के लिए पूर्णतया लाभदायक माना जाता है। यह अद्वितीय एवं नवीन प्रयोग है, जो बाण की तरह अचूक है और लक्ष्य सिद्धि के लिए प्रसिद्ध माना गया है।

                 आपकी साधना सफल हो और यह नवरात्रि आपके लिए मंगलमय हो! मैं सद्गुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानन्दजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

                 इसी कामना के साथ

ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश ।।