रविवार, 2 अप्रैल 2017

श्री हनुमान चालीसा सिद्धि

श्री हनुमान चालीसा सिद्धि



         श्रीराम नवमी और श्रीहनुमान जयन्ती निकट ही है। इस बार श्रीराम नवमी ५ अप्रैल २०१७ और श्रीहनुमान जयन्ती ११ अप्रैल २०१७ को आ रही है। आप सभी को श्रीराम नवमी और श्रीहनुमान जयन्ती की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

                  शास्त्रों के अनुसार कलयुग में हनुमानजी की भक्ति को सबसे रूरी, प्रथम और उत्तम बताया गया है। हनुमानजी की भक्ति सबसे सरल और जल्द ही फल प्रदान करने वाली मानी गई है। यह भक्ति जहाँ हमें भूत-प्रेत जैसी न दिखने वाली आपदाओं से बचाती है, वहीं यह ग्रह-नक्षत्रों के बुरे प्रभाव से भी बचाती है। हनुमानजी को मनाने के लिए और उनकी कृपा पाने के लिए सबसे सरल उपाय है हनुमान चालीसा का नित्य पाठ।

         हनुमान चालीसा के बारे में आज के युग में कौन व्यक्ति नहीं जानता? सन्त प्रवर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित यह हनुमान चालीसा हिन्दी भाषी जगत् में सर्व प्रसिद्ध है। जिस प्रकार से श्रीरामचरित मानस का प्रचार-प्रसार है, उससे भी कहीं अधिक हनुमान चालीसा का है। प्रत्येक कल्याणकामी व्यक्ति के लिए बल, बुद्धि, विद्या इन तीनों की प्राप्ति परमावश्यक है। बलबुद्धिविद्या से रहित कोई भी व्यक्ति, जाति तथा राष्ट्र किसी भी प्रकार से सुखसमृद्धि का भाजन नहीं बन सकता और बलबुद्धिविद्या के स्रोत स्वयं रुद्रावतार भगवान् आंजनेय ही हैं। उनकी प्राप्ति के लिए उनके चरित्र चिन्तन के रूप में विरचित हनुमान चालीसा एक अमोघ साधन है।

         वस्तुतः हनुमान चालीसा एक विलक्षण साधना क्रम है, जिसमें कई सिद्धों की शक्ति एक साथ कार्य करती है। विविध साबर मन्त्रों के समूह सम यह चालीसा अनन्त शक्तियों से सम्पन्न है। अगर सूक्ष्म रूप से अध्ययन किया जाए तो यह हनुमानजी के ही मूल शिवस्वरुप के आदिनाथ स्वरुप की ही साबर अभ्यर्थना है। कानन कुण्डल, संकर सुवन, तुम्हारो मन्त्र, आपन तेज, गुरुदेव की नाईं, अष्टसिद्धि आदि विविध शब्द के बारे में साधक खुद ही अध्ययन कर विविध पदों के गूढ़ार्थ समझने की कोशिश करे तो कई प्रकार के रहस्य साधक के सामने उजागर हो सकते हैं।

         हनुमान चालीसा की साधना बड़ी ही सरल और सुगम है, थोड़े ही प्रयास से अल्पज्ञ बालक भी इसे याद कर सकता है। बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष कोई भी श्रद्धायुक्त होकर प्रात:काल शौच और स्नान के पश्चात् श्रीहनुमान जी की मूर्ति के समक्ष मन्दिर में या घर में ही श्रीहनुमान जी के चित्र के सामने, हो सके तो अगरबत्ती जलाकर श्रीहनुमान जी का ध्यान करते हुए इस चालीसा का नित्यप्रति पाठ करें। इससे वह सब प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर सुखसमृद्धि का पात्र बनेगा, इसमें सन्देह नहीं।

         यदि आप मानसिक अशान्ति झेल रहे हैं, कार्य की अधिकता से मन अस्थिर बना हुआ है, घर-परिवार की कोई समस्या सता रही है तो ऐसे में इसके पाठ से चमत्कारिक फल प्राप्त होता है, इसमें कोई शंका या सन्देह नहीं है।

         जो व्यक्ति प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसके साथ कभी भी कोई घटना-दुर्घटना नहीं होती। 

         हनुमान चालीसा की यह साधना सकाम प्रयोग तथा निष्काम प्रयोग दोनों ही रूपों में की जा सकती है। इसीलिए साधक को अनुष्ठान करने से पूर्व अपनी कामना का संकल्प लेना आवश्यक है। अगर साधक निष्काम भाव से यह प्रयोग कर रहा है तो संकल्प लेना आवश्यक नहीं है।

         साधक अगर सकाम रूप से साधना कर रहा है तो साधक को अपने सामने भगवान हनुमान का वीरभाव से युक्त चित्र स्थापित करना चाहिए अर्थात जिसमें वे पहाड़ को उठा कर ले जा रहे हों या असुरों का नाश कर रहे हों। लेकिन अगर निष्काम साधना करनी हो तो साधक को अपने सामने दासभाव युक्त हनुमान का चित्र स्थापित करना चाहिए अर्थात जिसमें वे ध्यान मग्न हों या फिर श्रीरामजी के चरणों में बैठे हुए हों।

         साधक को यह साधना क्रम एकान्त में करना चाहिए। अगर साधक अपने कमरे में यह क्रम कर रहा हो तो जाप के समय उसके साथ कोई और दूसरा व्यक्ति नहीं होना चाहिए। सकाम उपासना में वस्त्र लाल रहे, निष्काम में भगवे रंग के वस्त्रों का प्रयोग होता है।

         स्त्री साधिका हनुमान चालीसा या साधना नहीं कर सकती, यह मात्र मिथ्या धारणा ही है। कोई भी साधिका हनुमान साधना या प्रयोग सम्पन्न कर सकती है। मासिक रजस्वला समय में यह प्रयोग या कोई भी साधना नहीं की जा सकती है।

         आज सर्वजन हितार्थ श्री हनुमान चालीसा की साधना विधि प्रस्तुत की जा रही है, जो मुझ सहित अनेकानेक साधकों एवं हनुमान भक्तों द्वारा अनुभूत की हुई है।

साधना विधान :----------

           यह साधना साधक श्रीराम नवमीहनुमान जयन्ती अथवा किसी भी मंगलवार की रात्रि को शुरु कर सकता है तथा समय १० बजे के बाद का रहेगा। सर्वप्रथम साधक स्नान आदि से निवृत्त होकर लाल या भगवे वस्त्र धारण करके लाल आसन पर बैठ जाए। सकाम और निष्काम दोनों ही कार्यों में दिशा उत्तर ही रहेगी।

         साधक अपने समीप ही किसी पात्र में १०८ भुने हुए चने या १०८ तिल की रेवड़ियाँ रख ले। अब साधक अपने सामने किसी बाजोट पर लाल वस्त्र बिछा कर उस पर हनुमानजी का चित्र या यन्त्र या विग्रह और सदगुरुदेवजी का चित्र स्थापित करे। साथ ही भगवान गणपतिजी का विग्रह या प्रतीक रूप में एक सुपारी स्थापित करे। उसके बाद दीपक और धूप-अगरबत्ती जलाए।

         फिर साधक सामान्य गुरुपूजन करे और गुरुमन्त्र का कम से कम चार माला जाप करे। इसके बाद साधक सदगुरुदेवजी से हनुमान चालीसा साधना सम्पन्न करने की अनुमति ले और उनसे साधना की निर्विघ्न पूर्णता एवं सफलता के लिए प्रार्थना करे।

         फिर साधक भगवान गणपतिजी का सामान्य पूजन करे और " वक्रतुण्डाय हुम्" मन्त्र का एक माला जाप करे। तत्पश्चात साधक भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता एवं सफलता के लिए प्रार्थना करे।

          इसके बाद साधक भगवान हनुमानजी का सामान्य पूजन करे। उन्हें सिन्दूर से तिलक करे और फिर धूप-दीप अर्पित करे। साधक को भोग में गुड़ तथा उबले हुए चने अर्पित करने चाहिए। साथ ही कोई भी फल अर्पित किया जा सकता है। साधक दीपक तेल या घी का लगा सकता है। साधक को आक के पुष्प या लाल रंग के पुष्प समर्पित करना चाहिए।

          इस क्रिया के बाद साधक "हं" बीज का उच्चारण कुछ देर करे तथा उसके बाद अनुलोम-विलोम प्राणायाम करे। प्राणायाम के बाद साधक हाथ में जल लेकर संकल्प करे तथा अपनी मनोकामना बोले। अगर कोई विशेष इच्छा के लिए साधना की जा रही हो तो साधक को संकल्प लेना चाहिए कि मैं अमुक नाम का साधक अमुक गोत्र अमुक गुरु का शिष्य होकर यह साधना अमुक कार्य के लिए कर रहा हूँ। भगवान हनुमान मुझे इस हेतु सफलता के लिए शक्ति तथा आशीर्वाद प्रदान करे।

          इसके बाद साधक राम रक्षा स्तोत्र का एक पाठ या "रां रामाय नमः" का यथासम्भव जाप करे। जाप के बाद साधक अपनी तीनों नाड़ियों अर्थात इडा, पिंगला तथा सुषुम्ना में श्री हनुमानजी को स्थापित मान कर उनका ध्यान करे ----------

अतुलित बलधामं हेमशैलाभ देहं,                                                                      दनुजवन कृशानुं ज्ञानिनां अग्रगण्यं।                                            सकल गुणनिधानं वानराणामधीशं,                                                                          रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

          अब जो १०८ भुने हुए चने या तिल की रेवड़ियाँ आपने ली थी, वे अपने सामने एक कटोरी में रख लें तथा हनुमान चालीसा का जाप शुरू कर दे ———

श्रीहनुमान चालीसा

।। दोहा।।

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।                                                      बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवनकुमार।                                                                    बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

।। चौपाई।।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।                                 राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।                                          कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै।।                                                शंकर सुवन केसरी नन्दन। तेज प्रताप महा जगबन्दन।।

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।                                            प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।                                  भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे।।

लाय संजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।                                      रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।।                        सनकादिक ब्रहमादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते।।                                    तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।                                       जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं।।                               दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।                                                    सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना।।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै।।                                                   भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।                                              संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।                                    और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।।

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।                                             साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकन्दन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।                                     राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दु:ख बिसरावै।।                                     अन्त काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई। हनुमत् सेई सर्व सुख करई।।                                          संकट कटै मिटे सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जय जय जय हनुमान गौसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।                                          जो शत बार पाठ कर कोई। छूटहिं  बन्दी महासुख होई।

जो यह पढ़ै हनुमान् चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।                                 तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।

।। दोहा।।

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।                                                                      राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

           इस साधना में आपको श्रीहनुमान चालीसा के १०८ पाठ करने हैं। आप हनुमान चालीसा पढ़ते जाएं और हर एक बार पाठ पूर्ण होने के बाद एक चना या रेवड़ी हनुमानजी के यन्त्र/चित्र/विग्रह को समर्पित करते जाएं। इस प्रकार १०८ बार पाठ करने पर १०८ चने या रेवड़ियाँ समर्पित करनी चाहिए।

                   १०८ पाठ पूरे होने के बाद साधक पुनः "हं" बीज का थोड़ी देर उच्चारण करे तथा जाप को हनुमानजी के चरणों में समर्पित कर दे।

         यह साधना २१ दिनों की है। साधक या तो लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन यह साधना करे या हर मंगलवार को कुल २१ मंगलवार तक यह साधना करे।
 
                    २१ वें दिन आपके द्वारा पूरे १०८ पाठ करके चने या तिल की रेवड़ी जब चढ़ा दी जाए, तब उसके बाद साधना पूर्ण होने पर अन्तिम दिन मन्दिर जाएं और भगवान हनुमानजी के दर्शन करे। साथ ही साथ साधना के दौरान भी आप हनुमत दर्शन करते रहें।

         साधक-साधिकाओं को यह साधना शुरू करने से एक दिन पूर्व से लेकर साधना समाप्त होने के एक दिन बाद तक कुल २३ दिन तक ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है। लेकिन साधना २१ मंगलवार तक करने की स्थिति में प्रयोग के एक दिन पूर्वप्रयोग के दिन तथा प्रयोग के दूसरे दिन अर्थात कुल तीन दिन प्रति सप्ताह ब्रह्मचर्य पालन करना आवश्यक है।

          कुछ भी हो, कैसा भी संकट आए, आपने साधना शुरू कर दी तो छोड़ना नहीं। प्रभु आपकी परीक्षा भी ले सकते हैं। साधना से विचलित करेंगे ही, पर आप दृढ़ रहें, क्योंकि भक्ति में अटूट शक्ति है और एक बार आपने यह साधना कर ली तो जो आनन्द और जीवन में उत्साह का प्रवाह होगा - उसका वर्णन मैं अपनी तुच्छ बुद्धि से नहीं कर सकता। फिर भी इतना कह सकता हूँ कि इस साधना से निश्चित ही आप की अभिलाषा की पूर्ति होगी। क्योंकि तुलसीदास जी ने कहा है ना - "कवन सो काज कठिन जग माही, जो नही होहि तात तुम पाहि।"

          साधना का क्रम यही रहेगा, २१ दिन या २१ मंगलवार तक तथा प्रतिदिन जो १०८ चने या तिल की रेवड़ी आप ने प्रभु को अर्पण किए थे, वो आप ही को खाना है, किसी को देना नही है।

          आपकी यह श्रीहनुमान चालीसा साधना सफल हों और आपको भगवान हनुमानजी का आशीर्वाद प्राप्त हों ! मैं सदगुरुदेवजी से यही प्रार्थना करता हूँ।

         इसी कामना के साथ 
  
     ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश॥


रविवार, 19 मार्च 2017

कुञ्जिका स्तोत्र साधना विधान

कुञ्जिका स्तोत्र साधना विधान

           चैत्र नवरात्रि पर्व निकट ही है। इस वर्ष यह नवरात्रि २८ मार्च २०१७ दिन मंगलवार से शुरु हो रही है। आप सभी को नवरात्रि पर्व की अग्रिम रूप से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ!

           कुञ्जिका स्तोत्र एक अत्यधिक प्रभावशाली स्तोत्र हैजो माँ भगवती जगदम्बा दुर्गा का है। माँ दुर्गा को जगत माता का दर्जा दिया गया है। माँ दुर्गा को ही आदिशक्ति भी कहा जाता है। इस स्तोत्र के पाठ मात्र से ही सम्पूर्ण दुर्गापाठ का फल प्राप्त होता है। यह स्तोत्र स्तम्भन,  मारणमोहनशत्रुनाशसिद्धि-प्राप्तिविजय-प्राप्तिज्ञान-प्राप्ति अर्थात सभी क्षेत्रों में प्रवेश की महाकुञ्जी है। प्रतिदिन प्रातःकाल सिद्धकुञ्जिका स्तोत्रम् का पाठ करने से सभी प्रकार के विघ्न-बाधा नष्ट हो जाते हैं व परम सिद्धि प्राप्त होती है। इसके पाठ से काम-क्रोध का मारणइष्टदेव का मोहनमन का वशीकरणइन्द्रियों की विषय-वासनाओं का स्तम्भन और मोक्ष-प्राप्ति हेतु उच्चाटन आदि कार्य सफल होते हैं।

           कुञ्जिका स्तोत्र वास्तव में सफलता की कुञ्जी ही है। सप्तशती का पाठ इसके बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। षटकर्म में भी कुञ्जिका रामबाण की तरह कार्य करता है। इस स्तोत्र को जागृत या सिद्ध स्तोत्र कहा गया हैजिसका मतलब है कि यह स्वयंसिद्ध हैआपको इसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु जब तक इसकी ऊर्जा को स्वयं से जोड़ न लिया जाएतब तक इसके पूर्ण प्रभाव कम ही दिख पाते हैं।

           आप किसी  भी साधना को करते हैं तो यह आवश्यक है कि आप मूल साधना को कम-से-कम ४-५ बार करें और उसके बाद उसकी निरन्तरता बनाए रखने के लिये नित्य कवच या मन्त्र का कुछ मात्रा में पाठ या जाप करें। विशेषतया कवच या स्तोत्र आदि की सिद्धि १००० पाठ से हो जाती है और इस तरह ४ या ५ बार में कुल चार या पाँच हजार पाठ सम्पन्न हो जाते हैं। कुछ कवचों और स्तोत्रों में उनकी पाठ संख्या दी गई होती है। इन सबके के बाद ही आप कवच या स्तोत्र में लिखे प्रयोग आदि को करने की पात्रता अर्जित करते हैं। 

साधना विधान :------------

          साधक किसी भी मंगलवार अथवा शुक्रवार से यह साधना आरम्भ करे। यदि  नवरात्रि  काल  में  यह साधना की जाए तो अधिक उचित रहेगा। समय रात्रि १० बजे के बाद का हो और ११.३० बजे के बाद कर पाए तो और भी उत्तम होगा। लाल वस्त्र धारण कर लाल आसन पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठ जाए। अपने सामने बाजोट पर लाल वस्त्र बिछा दे। उस पर माँ भगवती दुर्गा का चित्र और पूज्य गुरुदेवजी का सुन्दर चित्र स्थापित करें। साथ ही साथ साधक गणेश और भैरव की मूर्ति  अथवा दो सुपारी मौलि बाँधकर क्रमशः अक्षत और काले तिल की ढेरी पर स्थापित कर दे।

           साधना से पूर्व साधक संक्षिप्त गुरुपूजन करें और  फिर गुरुमन्त्र की कम से कम चार माला जाप करें।  इसके बाद साधक सद्गुरुदेवजी से कुञ्जिका स्तोत्र साधना करने की अनुमति लें और साधना की सफलता के लिए प्रार्थना करें।

           फिर साधक संक्षिप्त गणेशपूजन  करे और निम्न गणेशमन्त्र की एक माला जाप करे -------

                 वक्रतुण्डाय हुम् ॥

           इसके बाद साधक साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए भगवान गणपतिजी से प्रार्थना करें।

           फिर  साधक  संक्षिप्त भैरव पूजन सम्पन्न करे और  निम्न भैरव मन्त्र की एक माला जाप करें ---

                भं भैरवाय नमः ॥

           इसके बाद साधक साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए भगवान भैरवजी से प्रार्थना करें।

           इसके बाद साधना के प्रथम दिवस पर साधक को संकल्प अवश्य लेना चाहिए।

           साधक हाथ में जल लेकर संकल्प ले कि माँ ! मैं आज से सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र का अनुष्ठान आरम्भ कर रहा हूँ। मैं नित्य ९ दिनों तक ११२ पाठ करूँगा। माँ ! मेरी साधना को स्वीकार कर मुझे कुञ्जिका स्तोत्र की सिद्धि प्रदान करे तथा इसकी ऊर्जा को मेरे भीतर स्थापित कर दे। 

           फिर जल भूमि पर छोड़ दे।

           अब साधक माँ दुर्गा का सामान्य पूजन करे एवं तेल अथवा घी का दीपक प्रज्ज्वलित करे। किसी भी मिठाई को प्रसाद रूप में अर्पित करे और और साधक ११२ पाठ आरम्भ करे।

सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।                                  येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥१॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।                                    न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।                                      अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।                                     मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।                                 पाठमात्रेण संसिद्धयेत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥

॥ अथ मन्त्रः ॥

॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय-ज्वालय ज्वल-ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥

 इति मन्त्रः ॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै  नमस्ते मधुमर्दिनि।                                     नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥१॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।                                 जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे॥२॥

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।                                   क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोSस्तु ते॥३॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।                                    विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥४॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।                                  क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥५॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।                                     भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥६॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं।                                 धिजाग्रं-धिजाग्रं त्रोटय-त्रोटय दीप्तं कुरु-कुरु स्वाहा॥७॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।                                  सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥८॥

फलश्रुति

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्र जागर्ति हेतवे।                                 अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥१॥

यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।                                   न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥२॥

           इसी प्रकार साधक ९ दिनों तक नित्य  यह अनुष्ठान करे। प्रसाद नित्य स्वयं खाए। इस तरह ९ दिनों में कुल १००८ पाठ हो जाएंगे और कुञ्जिका स्तोत्र आपके लिए सिद्ध हो जाएगा।

           इस प्रकार कुञ्जिका स्तोत्र साधक के लिए पूर्ण रूप से जागृत तथा चैतन्य हो जाता है। फिर साधक इससे जुड़ी कोई भी साधना सफलता पूर्वक कर सकता है।

कुछ अवश्यक नियम :------------

     १. साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करना आवशयक हैकेवल देह से ही नहीं अपितु मन से भी  आवश्यक है।

     २. साधक भूमि शयन कर पाए तो उत्तम होगा।

     ३. कुञ्जिका स्तोत्र पाठ  के समय मुख में पान रखा  जाए तो इससे माँ प्रसन्न होती है। इस पान में चूनाकत्था और इलायची के अतिरिक्त  और कुछ ना ड़ाले। कई साधक सुपारी और लौंग भी डालते  हैंपर इतनी देर पान मुख में रहेगा तो सुपाऱी  से जिह्वा कट सकती है तथा लौंग अधिक समय मुख में रहे तो छाले हो जाते हैं। अतः ये दो वस्तुएँ ना डाले।

     ४. अगर नित्य कुञ्जिका स्तोत्र पाठ  समाप्त करने के बाद एक अनार काटकर माँ  भगवती जगदम्बा को अर्पित किया जाए तो इससे साधना का प्रभाव और अधिक हो जाता है। परन्तु यह अनार साधक को नहीं ख़ाना चाहिए। इसे नित्य प्रातः गाय को दे देना चाहिए।

     ५. यदि आपका रात्रि में कुञ्जिका स्तोत्र पाठ  का अनुष्टान चल रहा  है तो नित्य प्रातः पूजन के समय किसी भी माला से ३ माला नवार्ण मन्त्र की जाप करे -------

                 ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे 

          इससे यदि साधना काल में आपसे कोई त्रुटि हो रही होगी तो वह समाप्त हो जाएगी। वैसे यह आवश्यक अंग नहीं हैफिर भी साधक चाहे तो कर सकते हैं।

     ६. अपनी साधना गोपनीय रखे। गुरु तथा मार्गदर्शक के अतिरिक्त किसी अन्य को साधना समाप्त होने तक कुछ न बताएना ही साधना सामाप्त होने तक किसी से कोई चर्चा करे।

     ७. जहाँ तक सम्भव होसाधना में सभी वस्तुएँ लाल रंग की ही प्रयोग करे।

         जब साधक उपरोक्त विधान के अनुसार कुञ्जिका स्तोत्र को जागृत कर लेतब इसके माध्यम से कई प्रकार के काम्य प्रयोग किए जा सकते हैं।

         माँ भगवती जगदम्बा आप और आपके परिवार का कल्याण करेसाथ ही आपकी साधना सफल हो और आपको माँ भगवती का वरदहस्त प्राप्त होमैं सदगुरुदेवजी से ऐसी ही प्रार्थना करता हूँ।

        इसी कामना के साथ 

       ॐ नमो आदेश निखिल को आदेश आदेश आदेश॥